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सोमवार, सितंबर 4

आतंकवाद के खिलाफ नवम ब्रिक्स सम्मेलन का घोषणापत्र


“हम क्षेत्र में तालिबान, आईएसआईएस, अल कायदा और उनके साथी संगठनों पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्करे तैयबा और जैश ए मोहम्मद, तहरीके तालिबान पाकिस्तान, हिज़्ब उत्तहरीर आदि की हिंसा के कारण नाज़ुक सुरक्षा स्थिति से चिंतित हैं।

जो  तोड़ी  चुप्पी तो सलवटों ने,  किसी  के  माथे पे घर बनाया

किसी ने अपना छिपाया चेहरा ,  किसी का रुतबा है तमतमाया !
          ब्रिक्स सम्मलेन  में आतंकवाद के खिलाफ आए घोषणापत्र के आम होते ही आतंकवाद लिए शैल्टर बने चीन, मुख्य पालनहार  बने पाकिस्तान और खुद  टेरेरिस्ट ग्रुपों की स्थिति इस शेर में अभिव्यक्त है. लगातार आतंकवाद और आतंकियों को यू एन में रक्षाकवच पहनाकर सुरक्षित निकालने वाले चीन की जिस तरह से कूटनीतिक पराजय हुई है उससे साबित हुआ है कि - हिंसा के खिलाफ सारा विश्व एक धुन में शान्तिगीत गा रहा है . 
          सिक्के के दूसरे भाग को देखें तो  चीन अब मदमत्त सांड को अपने आंगन में बांधने से कहीं न कहीं परहेज़ कर रहा है. वज़ह साफ़ है कि उसे अपनी उत्पादित सामग्रियों को बेचना है. एक चतुर व्यापारी तभी सफल होता है जब वह  ग्राहक की नज़र में कर्कश क्रूर न हो ईमानदार हो. लोग दूकान को भी साफ सुथरी देखना चाहतें हैं . चीन रूपी दूकान के सामने "आतंकवाद के संरक्षण का सांड" अधिक समय तक बंधे रहने में चीन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बार बार शर्मिन्दगी उठानी पड़ रही है. 
        चीन को इस बात का इल्म भी अच्छी तरह है कि - आतंकवाद का संपोषण का परिणाम 9/11 से अधिक भी हो सकता है. भारत में "भस्मासुर" को बच्चा बच्चा जानता है विश्व ने भले उसे 9/11 को देखा हो . 
        भारतीय विश्वनीति में जिस तेज़ी से बदलाव आये हैं उसे समझाने की अब ज़रूरत महसूस नहीं हो रही . 
ब्राजील रूस इंडिया चीन दक्षिण अफ्रीका के संगठन ब्रिक्स में भारत ब्राजील रूस और दक्षिण आफ्रीका के बीच अत्यंत समझदारी भरे सम्बन्ध हैं जबकि चीन एक ऐसा देश है जिसके वैश्विक सम्बन्ध अगर बेहतर हैं भी तो सिन्क्रोनाइज़्ड शायद ही हों. भारत के साथ तो सम्बन्ध सदा असामान्य ही रहे हैं.
दक्षिण एशिया में नवम  ब्रिक्स सम्मेलन के पूर्व डोकलाम पर भारत के साथ चीन का तनावयुक्त वातावरण चीनी विश्वनीति का दुष्परिणाम ही रहा है. जिस तेज़ी से चीन के सरकारी मीडिया के ज़रिये चीन  की चीखें सुनाई दे रहीं थीं उसका उत्तर हमारे देश के निजी मीडिया (टेक्स्ट एवं डिजिटल मीडिया ) ने देकर ऐसा वातावरण बनाया कि चीन ने  खुदको अपनी सीमाओं में सीमित करने को ही उचित माना . हमारी सरकार ने अधिकृत रूप से कम ही कहा और जब भी कहा तो ये सन्देश पूरे विश्व में यही गया कि एशिया में सबसे शरारती चीन है . यही कूटनीति थी कि विश्व के अधिकाँश देश भारत के पक्षधर हुए और केवल वह अपने  पालित दास पाक सनकी पडौसी उत्तर-कोरिया के साथ नज़र आया. स्थिति सामान्य होते ही ब्रिक्स सम्मेलन में श्री नरेन्द्र मोदी जी का सभी सदस्य राष्ट्राध्यक्षों को आतंकवाद की मुखालफत के लिए तैयार कर  भारत ने  कूटनीतिक सफलता का नया कीर्तीमान स्थापित कर लिया जो इतिहास में अब दर्ज है
 चीन पर भरोसा कितना किया जावे :- इस तरह के सवाल स्वाभाविक हैं अभी तो चीन पर भरोसा 100% करना ज़ल्दबाजी ही है . विश्व चाहता है कि चीन उत्तर-कोरिया की सनक को कम करे यदि जिंग-पिंग साहब  यह कर सके तो विश्व में उनका सम्मान बढ़ सकता हैं . 
क्या पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी संगठन प्रभावित होंगे :- ये दूसरा अहम सवाल है अगर आप पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को देखें तो यह देश हमसे 20 वर्ष पीछे है . यही  सवाल बरसों से उसकी आवाम कर  रही है कि- रक्षा बज़ट के सापेक्ष विकास के लिए पाक कब संवेदित होगा ? अगर पाकिस्तान चाहे तो अपनी आवाम के मुस्तकबिल को खुद सवाँरे अन्यथा आने वाले 20 वर्षों में उसकी जनता विश्व की सर्वाधिक दुखी जनता होगी. विकल्प पाक के पास थाल में सजा उसकी आर्मी-डोमिनेटेड सरकार के सामने है. 
तीसरा और अंतिम सवाल यह भी इस सम्मेलन के बाद सामने आता है कि क्या - ब्रिक्स सफल होगा ? अगर आतंक के विरोध में सब एक सुर में हैं तो ब्रिक्स देशों के विकास की ऊँचाइयों को कोई रोक नहीं सकता . इन राष्ट्रों में आपसी व्यावसायिक  समन्वयन की प्रक्रिया अन्य कोई विषम  परिस्थिति पेश न आए तो तेज़ होना तय है . यद्यपि पूरे संयुक्त घोषणा पत्र के अध्ययन के उपरांत कुछ कहना बेहतर होगा . 
     
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  • सम्मेलन :- ब्रिक्स शिखर बैठक
  • आयोजन स्थल : चीन के फुजियान प्रांत में तटीय शहर शियामेन 
  • आवृत्ति :-  नवम 
  •  सम्मिलित सदस्य देश एवं उनके राष्ट्राध्यक्ष  :   मेज़बान चीन / राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत /  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , रूस / राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन, दक्षिण अफ्रीका/ राष्ट्रपति जैकब जूमा और ब्राज़ील / राष्ट्रपति मिशेल तेमेर 
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