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गुरुवार, सितंबर 29

सूचना का अधिकार कहीं ब्लैक-मेलिंग का साधन तो नहीं

सूचना के अधिकार को लेकर लोग जिनको जागरूकता होनी चाहिये वे जागरूक हैं या नहीं ये एक चिंतन का विषय है किंतु कितने लोग सूचना के अधिकार का अनुप्रयोग किसी को ब्लैक-मेल करने के लिये करे इस बात पर विचार करना ज़रूरी है. हालिया दिनों में आर टी आई के बेजा स्तेमाल के मामला सामने आया जिसमें एक व्यक्ति ने एक महिला सह कर्मी के विवाह को लेकर सवाल पूछा था.बिजनेस-स्टैण्डर्ड में प्रकाशित एम जे एंटनी के आलेख में दिये उदाहरण से पुष्टि होती कि दुरुपयोग होने लगा है-" न्यायालय ने एक ऐसी अपील खारिज कर दी थी जिसमें आवेदक सभी निचली अदालतों में संपत्ति का एक मुकदमा हार जाने के बाद यह जानना चाहता था कि आखिर किस वजह से न्यायधीशों ने उसके खिलाफ फैसला सुनाया। खानपुरम और प्रशासनिक अधिकारी के इस मामले में दिए गए फैसले में कहा गया, 'कोई न्यायधीश यह बताने के लिए मजबूर नहीं है कि आखिर किस वजह से वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचा।" (संदर्भ:-बिजनेस-स्टैण्डर्ड)
                             बेहतरीन कानून का दुरुपयोग होना भारत के लिये कितना घातक होगा  इस बात का अंदाज़ा भी होना चाहिये. अरविंद केजरीवाल  खुद कहते हैं कि "सूचनाके अधिकार का कानून फूलों की सेज नहीं है"हालांकि ये बात केज़रीवाल जी नें जिन संदर्भों में कही वो केवल आवेदक का पक्ष था किंतु अधिकतर सूचना के अधिकार के तहत किये गए आवेदन "वै्यक्तिक" कारणो से प्रेरित  होते हैं. जो कहीं न कहीं प्राप्त सूचना के दुरुपयोग की आहट हैं. इससे अथवा मानसिक क्लेश का कारण भी होते हैं.इन दिनों कुछ आपराधिक-वृत्ति के ब्लेकमेलर लोग इस कल्याणकारी कानून का धड़ल्ले से स्तेमाल करने से नहीं चूकते. 
व्यक्तिगत रूप से मैं  कदापि कानून के खिलाफ़ नहीं हूं. बल्कि उसके व्यक्तिगत-आघात हेतु उपयोग के  खिलाफ़ हूं. मेरी राय में कानून का प्रयोग करने वाले व्यक्ति/व्यक्तियों के सवालों / चाही गई जानकारियों की वज़ह भी पूछना आवश्यक होगा तथा यह सहमति लेना कि प्राप्त-सूचना का  किसी के मानवाधिकार अथवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सम्मान को क्षतिग्रस्त  दुष्प्रचार के लिये न करने का आश्वासन लेने का प्रावधान भी होना चाहिये. ताक़ि सूचना के अधिकार जैसे आवश्यक क़ानून का बेजा स्तेमाल न हो इस हेतु कानून में ऐसे सेफ़्टी-गार्ड अब बेहद ज़रूरी है.