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सोमवार, जून 1

“क्यों नहीं कर पा रहे हैं भारतीय पूंजी निर्माण”

     
  भारत जिन मौलिक समस्याओं से जूझ रहा है उसमें सबसे आगे रखना चाहूंगा भारतीयों की पूंजी निर्माण की गति में कमी . भारतीय औसतन सार्वजनिक सोच वाला होता है . उसे अपने अलावा परिवार, कुटुंब, आस-पड़ोस, समाज सबके बारे में सोचना होता है .  उसकी उत्सव प्रियता को कोई प्रतिबंधित करे कदापि स्वीकार्य नहीं .
उत्सव एवं मुदिता के मुद्दों पर उसे धन खर्चना सर्वाधिक पसंद है . अवकाश भी उसे निरंतर ज़रूरी होते हैं पर सामान्य रूप से अपेक्षाकृत अधिक कर्मठ होने के गुण एवं तीव्र उत्पादन  क्षमता के कारण भारतीय व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता . जब वो पूंजी बनाने के लिए आमादा हो जाता है तो शुद्ध रूप से कर्मठता के सहारे  जीतता है आगे बढ़ता है समृद्धि के करीब जाता है .. समृद्ध भी होता है इसके कई उदाहरण हैं . जिनका यहाँ ज़िक्र तुरंत करना आवश्यक नहीं है .
संक्षेप में यह संकेत है कि भारतीय अगर पूंजी-निर्माता हो जाए तो तय है कि उसकी उद्यमिता उसे आगे ले जाने में सहायक होगी . किन्तु पूंजी निर्माण की अपनी बाधाएं हैं रोज़ रोज़ मूल्यों में अस्थिरता भारतीयों को पूंजी निर्माण से रोक रही है .
फिर कराधान एवं लाभ के व्यापारिक दुश्चक्र  को ले लीजिये एक रूपए मूल्य की वस्तु का बाज़ार मूल्य तीन से दस गुना होता है . कभी कभी बीस-तीस गुना अधिक होना भी भारतीय के जेब से धन बाहर लाने का प्रमुख कारण हो जाती है जिससे उसकी बचत बनाम पूंजी निर्माण की स्थिति नकारात्मक दिशा में चली जाती है .
उदाहरण के तौर पर आप आलू चिप्स लीजिये – मेरी माँ मेरे बच्चों की माँ से अधिक समझदार थीं . आलू के विभिन्न प्रकार के चिप्स घर में तैयार रखतीं थीं . जिसका परम्परागत प्रसंस्करण होता था वर्षों तक यह कमोडिटी सुरक्षित रहती थी शुद्धता के बारे में कोई चुनौती न थी . अधिकतम 70-80 रुपयों में साल भर के सुस्वादु आहार का स्थान कास्ट-एन्हांसमेंट के सिद्धांत पर बाज़ार में प्रस्तुत टी वी विज्ञापन वाले चिप्सों से कहीं आगे था . आज वर्ष भर के लिए चिप्स पर कम से कम आठ हज़ार रूपए खर्च किये जाना सामान्य सी बात हो गई है . तीस बरस में हमने न केवल चिप्स खोया बल्कि फास्ट लाइव मूव के लिए पूंजी निर्माण की गति को धीमा भी कर दिया . यानी हम व्यावसायिक षडयंत्र के शिकार हो गए . पर मानें या न मानें युवा ऐसी स्थितियों से उकताने लगेंगें जैसे ही उनके ज़ेहन में पूंजी निर्माण की बात आती है तो बेशक वो परम्परा के पुनरीक्षण (रीव्यू) में जुट जाएगा ऐसा मेरा मानना है  .

टेक्स पर भी सरकारों को विशेष रूप से ध्यान देना होगा . अगर एक व्यक्ति मान लीजिये पांच लाख आय अर्जित करता है तो उसे शुद्ध रूप से सेवा, स्वास्थ्य, शिक्षा , उर्जा, उत्सव मनोरंजन, यात्रा  , पर सब कुछ  ख़त्म कर देना होता है . वार्षिक बचत के नाम पर अगर दस बीस हज़ार बचा भी लिए तो वह उसका भाग्य ही मानिए . यहाँ यह बता दूं कि आय से क्रय की गई सेवाओं एवं वस्तुओं का वास्तविक मूल्य व्यय के सापेक्ष 70% से 80% मात्र होता है . यानी कराधान एवं बेलगाम लाभ अर्जन की व्यावसायिक प्रणाली के चलते भारतीय नागरिक 70 प्रतिशत मूल्य की सेवा अथवा कमोडिटी भुगतान के सापेक्ष चुका रहा है ऐसे में पूंजी निर्माण का स्वप्न मारीचिका ही है .