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शनिवार, मई 10

"जिस तरह हंस रहा हूँ मैं पी के अश्क ए गम कोई दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े" कैफ़ी साहब को श्रृद्धांजली


कैफ़ी आज़मी साहब की लाइने हमारे हिंदुस्तान की सौ फ़ीसदी सच्ची तस्वीर है. 2002 आज़ ही के दिन यानी 10 मई को हमसे ज़ुदा हुए कैफ़ी आज़मी साहब तरक्क़ी पसंद शायर की फ़ेहरिश्त में सबसे अव्वल माने जाते हैं.
देखिये उनकी एक नज़्म -
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी ।  
   बेशक इस नज़्म की एक पंक्ति को देखिये
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,
रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए ।
      मज़दूरों की कड़ी मेहनत कल सुबह का इंतज़ार करती आंखों का ज़िक्र बड़े सलीके से किया है . फ़िर आपसी वैमनस्यता को रेखांकित करती ये नज़्म-
 ऐ सबा! लौट के किस शहर से तू आती है?
तेरी हर लहर से बारूद की बू आती है!
खून कहाँ बहता है इन्सान का पानी की तरह 
जिस से तू रोज़ यहाँ करके वजू आती है?
धाज्जियाँ तूने नकाबों की गिनी तो होंगी 
यूँ ही लौट आती है या कर के रफ़ू आती है?
अपने सीने में चुरा लाई है किसे की आहें
मल के रुखसार पे किस किस का लहू आती है !
      पाकीज़ा गांवों में कम अक्ल शहरों आने वाली हवाओं  पूछना भारतीय शायरी में ये नज़्म बेज़ोड़ और कालजयी बन पड़ी है. मसलन शायर वो सब कुछ देख लेता है जो अल्लाह यानी ईश्वर को मालूम होता है. उसे एहसास हो ही जाता है कि – कहीं कोई क्रोंच मारा गया है तब नज़्म जन्म लेती है, कविता जन्मती है ग़ज़ल गूंजती है.
          कैफ़ी साहब ने तीखा तंज़ किया है सियासत पर कुछ इस तरह
हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर है
मस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले
इसको मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले  

इसी नज़्म में आम बोल चाल के शब्दों के प्रयोग से बहुत गहरी बात कह गए
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगा
आज ईंटों की हुरमत बचा तो चले
बेलचे लाओ, खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ, कुछ पता तो चले
        कैफ़ी साहब की इस नज़्म में हमेशा मौज़ूदा हालातों का ज़िक्र रहा है. ऐसे मंज़र हम सब देखते हैं पढ़ते हैं...  पर उनको नसीहत के रूप में शब्द देकर आकृति देना उम्दा साहित्यकर्म की बानगी होती है.. कैफ़ी साहब की शायरी कुछ यूं ही थी.
 बचपन में कभी जब बार मैने उनका गीत होके मज़बूर पहली बार समझ के साथ सुना तो लगा कि वाक़ई उम्दा शायरी में क्या क्या हो सकता है बस एहसास में आना ज़रूरी है उन सब घटनाक्रमों का .. अब आप ही सोचें इस स्थिति-गीत (सिचुएशन सांग) को कैसे महसूस किया होगा कैफ़ी साहब ने. अब के फ़िल्म निर्माता सच भाग्य विहीन या लालची जो चिकनी चमेलियां दिखा सुना कर उस पर न्यौछावर रुपयों को अपनी झोली भरते हैं. ये तो कोठों को प्रबंधित करने वालों जैसी हरक़त हुई.
  बहरहाल क्या फ़ायदा इन सब बातों से.. ज़िक्र कैफ़ी साहब का है तो वही करूंगा वरना अच्छी यादों को लोग ज़ल्द भुलाते देते हैं ...
कैफ़ी आज़मी की इस नज़्म पर एक नज़र
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया है 
दोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँ
कोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहीं
किस को दिल नज़र करूँ और किसे जाँ नज़र करूँ?
तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरे
आशना मुझ से मगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
ख़त्म है तुम पे मसीहानफ़सी चारागरी
मेहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं
दस्त-ओ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं
जिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़
आज सजदे वही आवारा हुए जाते हैँ
दूर मंज़िल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थी
लेके फिरती रही रास्ते ही में वहशत मुझ को
एक ज़ख़्म ऐसा न खाया के बहार आ जाती
दार तक लेके गया शौक़-ए-शहादत मुझ को
राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआ
जुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहीं
एक के बाद ख़ुदा एक चला आता था
कह दिया अक़्ल ने तंग आके 'ख़ुदा कोई नहीं'