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बुधवार, अप्रैल 20

दृढ़ता कभी नहीं रोती और अन्य दो कविताएँ

दृढ़ता कभी नहीं रोती 
मैं एक अहर्निश अविरल सा शोकगीत
मृत्यु छंद में आबद्ध जीवंत हूँ जीवट हूँ 
मरता हूँ तो भी सवालखिया हाथी सा
जीता हूँ तो भी बेशकीमती पाखी सा 
मेरी एक एक बूँद जमीं पर गिरती है 
फिर जी उठता हूँ रक्तबीज जो हूँ । 
यातनाएं मुझे कुंठित नहीं कर जातीं
मृत्यु मुझे पाशबंधित नहीं कर पाती
मैं एक अवस्था हूँ एक व्यवस्था हूँ 
अत्यधिक सहने की चुप रहने की 
आपने किसी स्तूप के पत्थर को 
देखा है कभी रोते सुबकते ?
कभी तुमने देखा है
शेर शावकों हिरणों को 
बुद्ध से विलगते हुए 
नहीं न 
दृढ़ता कभी नहीं रोती 
मृदुल मुस्काती हुई 
छेड़ देती है शोकगीत 
दुनिया रोती है पर मैं
जो सुदृढ़ हूँ व्यवस्था हूँ 
जो रोती नहीं 
आप दुनिया हो रोते हो 
रोते रहोगे मेरे नाम पर .
खिलखिलाकर हँसना मना है
तुम औरत हो
तुम किन्नर हो
तुम अपाहिज हो
गंभीर बनो तुम्हारे मुँह से निकली हँसी ठीक नहीं
मनु-स्मृति में लिखा है
मत बैठाओ अपाहिजों को पंगत में संगत में
किसी ने क्या खूब कहा है
अक्ल हर बात को जुर्म बना देती है .
बेशक ... फाड़  दो ऐसा साहित्य
अग्राह्य कर दो हो जाओ तथागत
निर्विकार शांत
बनाओ ऐसा समाज जिसका
लक्ष्य हो  “निर्माता की रक्षा की जगह निर्माण की रक्षा का”
कबीर ने कहा था न
“मरी खाल से लोहा भस्म हो जाता है ”
मत रुलाओ अकिंचनों को
मत करो षडयंत्र
जीने दो ....... सांस उसकी है उसे दी है  निर्माता ने

जब भी मिलता है यश
अब जब भी मिलता है यश
प्रवाहित ........
नर्मदा की धार में कर देता हूँ
यश जिसे रोको तो एक लबादा बन जाता है
उतरता नहीं धुल में सना हो तो भी
स्टेटस सिम्बल सा चस्पा रहता है .. !
दिलो दिमाग पर
घर के बैठक खाने में सैल्फ बनवा कर सजा देता था ..
 इस दीवाली मुफ्त में रद्दी वाले को
काम वाली बिटिया को को दे दिए तमगे स्मृति चिन्ह
सब कुछ ........ कुछ नए आ गए हैं ....... इस दीवाली फिर निकाल दूंगा..
अहंकार से बचने ........ क्योंकि
अब जब भी मिलता है यश
प्रवाहित  जो कर देता हूँ
नर्मदा की धार में ....