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सोमवार, अगस्त 29

"मुझे कन्यादान शब्द से आपत्ति है


जब ये ट्विट किया कि  "मुझे कन्यादान शब्द से आपत्ति है..निर्जीव एवम उपयोग में आने वाली वस्तु नहीं है बेटियां ..!" और यही फिर  इसे वाट्स एप  पर डाला  तो लोग बचाव की मुद्रा में आ एन मेरे सामने आ खड़े हुए... बुद्धिवान लोग  मुझे  अज्ञानी संस्कृत और  संस्कृति का ज्ञान न होने वाले व्यक्ति का आरोप जड़ने  लगे . कुछेक ने तो संस्कार विधि नामक पीडीऍफ़ भेज दी . क्या बताऊँ सोशल-मीडिया  के विद्वानों को कि भाई मेरा आशय साफ़ है ..... कि बेटी को वस्तु मत कहिये ... आपकी बेटी में एक आत्मा है जिसका और खुद आपका  सर्जक ईश्वर है... हमको आपको सबको देह के साथ कुछ साँसें दान में मिलीं हैं..  ! बेटी आत्मजा है.. जिसका जन्म एक आत्मिक और आध्यात्मिक घटना है. पर परम पंडितों को लगा मैं धर्म विरुद्ध हूँ.. अरे भाई ... समझो .. बेटी दान देने की वस्तु नहीं बल्कि पुत्र के समतुल्य आपकी संतान है. उसे संघर्ष में मत डालो .... कोई खाप पंचायत ब्रांड सीमाओं में मत जकड़ो उसका दान नहीं सम्मान के साथ परिवार बसाओ उसका विवाह संस्कार संपन्न करवाओ.. परन्तु उसकी आत्म-ध्वनि को सुनो ....... समझो ....... उसे देवी कहते हो फिर भी दान करते हो...
मुझे मज़ा आने लगा ये सोच कर कि कोई क्यों सोच में बदलाव नहीं लाना चाहता क्योंकि अधिकाँश लोगों के अपने  मौलिक विचार नहीं हैं.. और वो  बदलाव के मूड में कतई नहीं होते ... और न कभी होंगे इतना ही नहीं कोई उनको विधर्मी होने देगा क्या..
एक मित्र का मत है कि- “ कन्यादान एक  महानदान है.”.. और यहाँ कन्या देने वाला बड़ा है.. लेने वाला याचक ?
मैंने मित्र से कहा ... भाई महान दान तो ईश्वर ने दिया है... हमको अर्थात हम खुद  भिक्षुक हैं याचक ...हैं..! एक भिखारी दानवीर कैसे होगा.. ?
मित्र : “.........” अवाक मुझे देखने लगा.. फिर अचानक कहा ... इससे हम दाता हो जाते हैं ...... ग्रहीता छोटा रह जाता है... बेटी को हम कहाँ नीचे देखने को मज़बूर करते हैं बताइये.. भला..?
मैंने कहा... भई... दामाद के पैर पूजते हो न ... ? उत्तर में हाँ सुनाई दिया .. क्यों .. यही विरोधाभास है विसंगति है.. अगर दाता हो तो दान में गर्व कैसा  ...? और दामाद जो पुत्र न होकर भी पुत्र तुल्य  है.. उसे अथवा उसके जनक को दान ग्रहीता साबित कर नीचा दिखाओगे.. ?
अब सब खामोश थे.. एक मित्र ने पूछा कि बेटी का विवाह न करोगे.. ? मैंने कहा.. अवश्य करूंगा पर कन्यादान नहीं ...... उसका उसके योग्य आत्मज  तुल्य वर से  परिणय संस्कार करूंगा ....!  तो फिर कन्यादान के उपवास से बचने इतना कुछ करोगे ..... ? मित्र का यह सवाल उसकी खीझ का प्रदर्शन था.. मैंने कहा - मित्र.... उपवास करके उस ईश्वर का आभार मानूंगा ... कि आपकी भेजी दो दो बेटियों को मैंने भ्रूण रूप में नहीं मारा मुझे विश्वास था वे मुझे सम्मान दिलाएंगी.. बेटों के समतुल्य मेरे सम्मान का कारण बनेंगी. हुआ भी यही और ईश्वर आप यही चाहते थे न ..... लो आज मैं तांबे की गंगाल में पानी की तरह पवित्र आत्मिक संबंधों में युवा पुत्रि और योग्यवर को एक दूसरे के वरन हेतु अंतर्पट खोल के आपके द्वारा  नियत व्यवस्था को निराहार रह कर बनाने का प्रयास कर रहा हूँ ... हे प्रभू आप नव युगल को आशीर्वाद देकर ........ सुखी वैभव संपन्न बनाएं....
एक अन्य मित्र बोल पड़े :- सनातनी शब्दों को तोड़ मरोड़ कर आप अर्थ बदलते हुए समझदार नहीं लगते... ?
“बेशक, सही कहा आपने मित्र सोचा है  सनातन अज़र अमर क्यों हैं..?”
हां........ इस लिए की वो ऋषि मुनियों की अथक साधना की वज़ह से ..!
मैं-“गलत,.. ऋषियों  मुनियों ने समाज को सामाजिक व्यवस्था दी थी... साथ ही वे बदलाव को देशकाल परिस्थिति के अनुसार स्वीकृति देते रहे . बदलाव को स्वीकारने से  किसी भी व्यवस्था को स्थाईत्व मिलता है ... वरना हम तालिबां होते.. ?”