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रविवार, अप्रैल 17

अंगुली पुराण भाग दो


  

 गोया कृष्ण जीं ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पे क्या उठाया हमने उनकी तर्ज़ पर हर चीज़ को अंगुली पे उठाना चालू कर दिया है । मेरे बारे मे आप कम ही जानते हैं ...! किन्तु जब अंगुली करने की बात हो तो आप सबसे पहले आगे आ जायेंगें कोई पूछे तो झट आप फ़रमाएंगे "बस मौज ले रहा था ?" अंगुली करने की वृत्ति पर अनुसंधान करना और ब्रह्म की खोज करना दोनों ही मामलों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है "नयाति -नयाति" अर्थात "नेति-नेति" सो अब जान लीजिये जिसे जो भी सीखना है सीख सकता है बड़ी आसानी से ...! ..........................................................................  ..... बहरहाल अंगुली का इस्तेमाल करो खूब जम के करो कोई गलत नहीं है पर ज़रा देख समझ के  कहीं ग़लत जगह चली गई तो अंगुली को खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है ....फ़िर मत कहना -"बताना तो था !!"
वरना बाबा  बाल ठाकरे ने क्या कहा था भारत के रत्न को की बाट जोहते सचिन भैया को
अब आगे :-
भास्कर से साभार 
ब्लागर जित गुप्ता  बोलीं कि हम तो अंगुली पर नचाना ही जानते हैं। जरूरत पड़े तो अंगुली टेडी करना भी जान जाते हैं। बज़ा फ़रमाया उनने, हमारे देश में जो भी कुछ था, है, रहेगा उसमें अंगुली का खास योगदान है. 
साभार विक्की पीडिया
चलिये एक कहानी सुनाए देता हूं :- एक  साहिब को हमारे होने न होने से कोई फ़र्क नही पड़ता हमने  न तो  उनकी भैंस बांधी  न ही उनकी पुश्तैनी बकरी के वंशज को हमने काटा पर किसी ने अंगुली कर दी हज़ूर हम पे बिफ़र गये. एक दिन बोले तुम से सारे सम्बध तोड़ता हूं 
हम बोले :- "जी साब,"
 उनसे हमारा रिश्ता कई बार टूटा कई बार हमने सोचा कि चलो काहे की बुराई पालें ग्वारीघाट में हम दौनो की बाड़ी जानी ही है तो काहे का बैर काहे की दुश्मनी पर हज़ूर लोगों से दुश्मनी यूं पालते जैसे कोई "कुत्ता बिलैया" पालने का शौकीन हो हम उनका मान रखने को उनसे अलग हो गये तो देखा हज़ूर को फ़िर भी चैन  नहीं .... इधर उधर अपनी कुंठित अंगुली करते नज़र आ रहे हैं. . .अपन ठहरे बे हया काहे का फ़र्क पड़ेगा हम पर हम पर फ़र्क न पड़ा जान हज़ूर ने अबकी बार अंगुली क्या पूरा का पूरा मुक्का  हमारी शान पर दे मारा. हम भी कम कलाकार नहीं दूर हट गये उधर से हटते ही भाई का घूंसा उर्फ़ मुक्का दीवार से टकराया सुना है अब हज़ूर प्लास्टर बांधे फ़िर रहे हैं. हां हमारा थोबड़ा सलामत है.  
           फ़त्ते जी की  सुख चैन की लाईफ़ चल रही थी कि एक दिन उनकी बीवी जिनकी अंगुलियों के इशारे पर वे नाचते थे कि रिश्ते अधेड़ कुआंरी  बहन जी आईं और न जाने क्या क्या पुरुष विरोधी बातें कि कि फ़त्ते जी के चरित्र पर   उनकी नवोढ़ा बीवी ने अंगुली उठाना शुरु कर दिया . बात इतनी बड़ गई कि - हालात तलाक तक पहुंच गये बमुश्किल भाई अपनी लाइफ़ बचा पाया. पालतू भैंसे की तरह आज़ कल जीवन गुज़ार रहा है. बेचारा........... 
    बाद में जाकर खुलासा हुआ कि जिस अंगुली बाज़ बहन की कुंठा की वज़ह से  नरक का आभास फ़त्ते  जी को हुआ उसका रिश्ता फ़त्ते जी के बड़े भाई के लिये आया था....
                            सरकारी गैर सरकारी संस्थानों में अंगुली बाज़ों की उपस्थिति न हो यह सम्भव कदापि नहीं.आगामी अंक में देखिये "संस्थानों के अंगुली बाज़ "