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ज्ञानरंजन जी करेंगे समीर लाल की कृति ’ देख लूं तो चलूँ’ का अंतरिम विमोचन

प्रवासी समीर अपनी यात्रा को फ़िल्म की तरह देखते हैं  और लिखते हैं लम्बी कहानी जो आकार ले लेती है उपन्यास का जी हां उनने यात्रा के दौरान देखा कि:-"स्कूली बच्चे वहां भी दुकान पर काम करते हैं. वहां भी कोई सिसकता नही बल्कि सोचता है इससे पर्सनाल्टी में निखार आयेगा. " लेखक  सोचता है कि ये वे ही लोग हैं जो भारत  में  ऐसी स्थिति को शोषण की संज्ञा देतें हैं. यदि भारत के बच्चे कामकाज करते हैं तो वो शोषण और पश्चिम में बच्चे काम करें तो उसे पर्सनाल्टी डेवलपमेंट करार दिया जाता है. लेखक यहाँ भारत की परिस्थियों की वकालत नहीं वरन बालश्रम के वैश्वीकरण को गलत साबित करते नज़र आ रहे हैं. यूं तो कई सवाल खड़े करती है यह कहानी बकौल अर्चना चावजी " समीर लाल "समीर" की नई पुस्तक "देख लूँ तो चलूँ" हमें भी अपने आस-पास देखने को मजबूर कर देती है ...सामान्य सी घटना में जिंदगी को बाँधे रखने की क्षमता होती है ..चाहे वो सड़क पर पास से गुजरने वाली किसी गाड़ी के मिरर से दिखती कोई छवि हो या किसी मित्र के घर की पूजा....बचपन से लेकर उम्र की ढलान तक गुजरा हर पल किसी न किसी याद को साथ लिए चलता प्रतीत होता है लेखक को ....ग्रामीण व शहरी किसी भी माहौल को भूल नहीं पाता लेखक" जी इस किताब पर एक लम्बी समीक्षा करना चाहता हूं  किन्तु विस्तार नहीं दूंगा अपनी समीक्षा को तब तक जब तक कि अंतरिम विमोचन नहीं हो जाता और यह विमोचन अधिक दूर नहीं आज जब मैं पोस्ट लिख चुकुंगा तबसे कोई 36 -37  घंटों की दूरी है तब तक शायद इस उपन्यासिका (साहित्यकार भले असहमत हों इस संज्ञा से ) "देख लूं तो चलूँ "   को दो बार पढ भी लूंगा .तो तब तक आप के लिए आपको यह सूचना देना ज़रूरी है कि यह किताब तीन घण्टे के अन्दर पढ़ी जा सकती है. यानी दिल्ली से जबलपुर की सत्रह घंटे की यात्रा में 5.66 बार . और हां आप सभी सादर आमंत्रित हैं अन्तरिम विमोचन पर 
 अंतरिम विमोचन समारोह "देख लूं तो चलूँ "
  • अध्यक्षता : श्री हरिशंकर दुबे
  • मुख्य-अतिथि एवम विमोचन-कर्ता : श्रीयुत ज्ञानरंजन
स्थान : होटल सत्य अशोक जबलपुर,
दिनांक :18/01/2011 सायं : 04:00 बजे 
आग्रह 
महेंद्र मिश्रा,डाक्टर विजय तिवारी ,संजू ,बवाल,प्रेमफर्रुखाबादी, विवेक रंजन श्रीवास्तव ,आनंद कृष्ण,राजेश पाठक प्रवीण, और साथ में हम भी 

टिप्पणियाँ

anitakumar ने कहा…
हम तो एक ही सांस में पूरी किताब पढ़ गये थे और बहुत मजा आया। समीर जी के लेखन को एक बार फ़िर सादर नमन।
गुड्डोदादी ने कहा…
समीर सुपुत्र
आशीर्वाद
आपका लेख पढ़ा एक ही बात मन में आई कि पच्छिम में बच्चे पढ़ने के साथ कामकरते हैं जब के देश में छोटे छोटे बच्चों को पेट के लिए काम करना पड़ता है देश के बच्चों का भाविष्य
यह बच्चे कल के माता पिता ओर देश की बागडोर संभालने वाले हैं
ललित शर्मा ने कहा…
और साथ में हम भी हैं .
ललित शर्मा ने कहा…
बधाई एवं शुभकामनाएं।
बेनामी ने कहा…
बहुत-बहुत बधाई!
किताब मिलने पर सब से पहला काम उसे पढ़ने का ही होगा। ज्ञानरंजन जी ने यह किताब पढ़ी हो तो उस पर उन का वक्तव्य सब से महत्वपूर्ण होगा।
जी.के. अवधिया ने कहा…
बधाई एवं शुभकामनाएं!
मुझे ये किताब पढने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है...ये किताब हिंदी साहित्य में मील का पत्थर साबित होगी इसमें संदेह नहीं...अपनी विशिष्ठ शैली में लिखे अपने संस्मरणों से समीर जी पाठक को अपना दीवाना बना देते हैं...इस किताब को पढना एक ऐसा अनुभव है जिस से गुजरने को बार बार दिल करता है...

नीरज
समीर जी को बहुत बहुत बधाई ..
वन्दना ने कहा…
बधाई एवं शुभकामनाएं!
समीर जी को बधाई एवं शुभकामनाएं...
ajit gupta ने कहा…
हम तो दो घण्‍टे में ही पढ़ गए थे। अच्‍छी पुस्‍तक है। मन कहीं भटकने ही नहीं देता। विमोचन से ही पहले यह लोकप्रिय हो चली है तो कैसा विमोचन? अब तो समीक्षा बैठक रखिए।
Hi Sameer darling, congrats...u did not sent me the copy of book darling? May I ask why u did not? love u darling n take care.
Dr. Amar Jyoti ने कहा…
एक ही बैठक में पूरी पुस्तक पढ़ गया.
सरल सहज शैली में चुटीला व्यंग परसाई
की याद दिलाता सा लगता है. हार्दिक
बधाई और शुभकामनाएं.
nilesh mathur ने कहा…
बहुत बधाई समीर जी को, इंतजार रहेगा इसे पढने का!
शरद कोकास ने कहा…
सबसे पहले समीर लाल जी को इस उपन्यास " देख लूँ तो चलूँ " के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई । आज ही मेरी ज्ञानरंजन जी से बातचीत हुई है । इस अवसर पर उपस्थित रहने की बहुत इच्छा थी । अत: इस विमोचन समारोह की सफलता के लिये शुभकामनायें प्रेषित कर रहा हूँ । सभी मित्रों को मेरा नमस्कार कहियेगा ।
समीर जी बहुत बहुत बधाई ........
PADMSINGH ने कहा…
पुस्तक विमोचन के लिए ढेरों बधाइयाँ... आशा है शीघ्र पढ़ सकूंगा
अनूप शुक्ल ने कहा…
अंतरिम विमोचन तो अब तक हो चुका होगा। उसके लिये बधाई।

इसके बाद के खचाखच फ़ाइनल विमोचन के लिये शुभकामनायें। :)
sanjay jha ने कहा…
alianetic khabar.....

badhai....


pranam.
डा. अमर कुमार ने कहा…
.
सर्वप्रथम समीर भाई को शत शत बधाईयाँ ।
अब दूसरी बात यह कि विमोचनवा तौ आज हुई रहा है,
अउर इत्ते इत्ते लोग कितबिया एक्कै साँस में पढ़ि गे !
ई का माज़रा है, हमरी तो साँस रुकी जा रही है !
sameer dadda,ak kitab mujhe bhi chahiye ,kaise milegi bataye ya bhejen...aabhar
देव कुमार झा ने कहा…
समीर दद्दा को किताब के लिये ढेरो बधाई, बस जल्दी से पढने का मन हो रहा है.....
बहुते बधाई हो हमरी तरफ़ से भी बबूआ।
Radhe Radhe Satak Bihari ने कहा…
जनाब जाकिर अली साहब की पोस्ट "ज्‍योतिषियों के नीचे से खिसकी जमीन : ढ़ाई हजा़र साल से बेवकूफ बन रही जनता?" पर निम्न टिप्पणी की थी जिसे उन्होने हटा दिया है. हालांकि टिप्पणी रखने ना रखने का अधिकार ब्लाग स्वामी का है. परंतु मेरी टिप्पणी में सिर्फ़ उनके द्वारा फ़ैलाई जा रही भ्रामक और एक तरफ़ा मनघडंत बातों का सीधा जवाब दिया गया था. जिसे वो बर्दाश्त नही कर पाये क्योंकि उनके पास कोई जवाब नही है. अत: मजबूर होकर मुझे उक्त पोस्ट पर की गई टिप्पणी को आप समस्त सुधि और न्यायिक ब्लागर्स के ब्लाग पर अंकित करने को मजबूर किया है. जिससे आप सभी इस बात से वाकिफ़ हों कि जनाब जाकिर साहब जानबूझकर ज्योतिष शाश्त्र को बदनाम करने पर तुले हैं. आपसे विनम्र निवेदन है कि आप लोग इन्हें बताये कि अनर्गल प्रलाप ना करें और अगर उनका पक्ष सही है तो उस पर बहस करें ना कि इस तरह टिप्पणी हटाये.

@ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा "और जहां तक ज्‍योतिष पढ़ने की बात है, मैं उनकी बातें पढ़ लेता हूँ,"

जनाब, आप निहायत ही बचकानी बात करते हैं. हम आपको विद्वान समझता रहा हूं पर आप कुतर्क का सहारा ले रहे हैं. आप जैसे लोगों ने ही ज्योतिष को बदनाम करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने का काम किया है. आप समझते हैं कि सिर्फ़ किसी की लिखी बात पढकर ही आप विद्वान ज्योतिष को समझ जाते हैं?

जनाब, ज्योतिष इतनी सस्ती या गई गुजरी विधा नही है कि आप जैसे लोगों को एक बार पढकर ही समझ आजाये. यह वेद की आत्मा है. मेहरवानी करके सस्ती लोकप्रियता के लिये ऐसी पोस्टे लगा कर जगह जगह लिंक छोडते मत फ़िरा किजिये.

आप जिस दिन ज्योतिष का क ख ग भी समझ जायेंगे ना, तब प्रणाम करते फ़िरेंगे ज्योतिष को.

आप अपने आपको विज्ञानी होने का भरम मत पालिये, विज्ञान भी इतना सस्ता नही है कि आप जैसे दस पांच सिरफ़िरे इकठ्ठे होकर साईंस बिलाग के नाम से बिलाग बनाकर अपने आपको वैज्ञानिक कहलवाने लग जायें?

वैज्ञानिक बनने मे सारा जीवन शोध करने मे निकल जाता है. आप लोग कहीं से अखबारों का लिखा छापकर अपने आपको वैज्ञानिक कहलवाने का भरम पाले हुये हो. जरा कोई बात लिखने से पहले तौल लिया किजिये और अपने अब तक के किये पर शर्म पालिये.

हम समझता हूं कि आप भविष्य में इस बात का ध्यान रखेंगे.

सदभावना पूर्वक
-राधे राधे सटक बिहारी

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