चाणक्य की अर्थवत्ता लेखक श्री नमः शिवाय अरजरिया

【 लेखक श्री नमः शिवाय अरजरिया, मध्यप्रदेश शासन में संयुक्त कलेक्टर के पद पर जबलपुर में कार्यरत हैं । उनकी फेसबुक वॉल से साभार आपकी समीक्षा आर्टिकल प्रस्तुत है ] 

चाणक्य नाम मन:पटल पर आते ही मौर्ययुगीन आचार्य विष्णुगुप्त या कौटिल्य का चित्र उभर कर सामने आता है। चणक ऋषि के पुत्र होने के कारण आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य कहलाए। चाणक्य का शाब्दिक अर्थ प्रतीति कराता है- जो चार नीतियों का विशेषज्ञ हो। बुंदेलखंड में आज भी चतुर लोगों को कहते हैं- बड़ा चणी आदमी है। यद्यपि शब्दकोश में इस प्रकार का अर्थ नहीं मिलता परंतु जबलपुर जिले के संस्कृत के प्रकांड पंडित आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी से जब चर्चा की उन्होंने भी चाणक्य के शाब्दिक अर्थ को मेरे मतानुसार पुष्ट किया। अतः इससे यह तो तय होता है कि "चा" यानि चार तथा "नक्य" यानी नीति। इस प्रकार चाणक्य चार नीतियों के विशेषज्ञ के रूप में ही प्रकट होते हैं। चार नीतियां हैं- साम, दाम, दंड एवं भेद। यहां साम का तात्पर्य विनय या प्रार्थना से है। दाम का अर्थ प्रलोभन या लालच से लिया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास मानस में लिखते है- "बहु दाम संवारहिं धाम जती" अर्थात दाम से अनेकों धाम भी संवर जाते है और कहीं न कहीं वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में सर्वाधिक उपक्रम इसी नीति पर आधारित है। दंड का अर्थ सजा देना है एवं भेद की पृष्ठभूमि मन से संबंधित है। यह नीति का ऐसा प्रयोग है जिसमें मनभेद कर दूसरे के प्रति एक स्थाई भाव मन में उतपन्न किया जाता है। भेद नीति को रहस्योद्घाटन के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके द्वारा किसी प्रिय या संबंधी के प्रति मन में विद्वेष उत्पन्न किया जाता है।
इतिहास के पन्ने पलटने पर आचार्य विष्णुगुप्त चारों नीतियों के विशिष्ट विद्वान दिखाई देते हैं। परंतु आचार्य विष्णुगुप्त के पूर्व भी यह नाम अस्तित्व में था बिलकुल वैसे ही जैसे राम के पूर्व जामदग्नेय परशुराम भी राम के रूप में जाने जाते थे। तो क्या आचार्य विष्णुगुप्त को चारों नीतियों का एकमात्र ज्ञाता या श्रेष्ठ आचार्य मान लिया जाए?? मन इसे स्वीकारने को तैयार नहीं था। आज अचानक सुंदरकांड पढ़ते हुए दशानन एवं हनुमान जी के सुंदर संवाद पर विशेष ध्यान गया, तो पाया कि आचार्य विष्णुगुप्त तो पृथक-पृथक समय पर चारों नीतियों का प्रयोग करते थे, परंतु नीतिवान श्रीराम के दूत मतिमान हनुमान तो एक ही समय एवं स्थान पर इन नीतियों का प्रयोग करने में पूर्ण दक्ष एवं कुशल थे।
सुंदरकांड के 21वें दोहे में वह श्री राम की प्रभुता का वर्णन करने के साथ-साथ लंकेश से पृथम नीति विनय का प्रयोग करते हैं। जब दशानन विनय से आंजनेय की बात नहीं मानता है तो वह श्रीराम की शरण में आने के परिणाम बताते हुए कहते हैं कि- लंकेश यदि तुम प्रभु श्री राम की शरण में आते हो तो वह तुम्हें क्षमा कर देंगे। इसके उपरांत तुम लंका में अविचल राज्य करना। इस प्रकार हनुमान जी दाम नीति के तहत अविचल राज्य का प्रलोभन देते हैं। जब दशानन इन नीतियों के प्रभाव में नहीं आता है तो वह दंड नीति का प्रयोग करते हुए श्री राम के बल का वर्णन करते हुए दशग्रीव को राम से युद्ध के परिणाम के रूप में कहते हैं, कि राम के विमुख होने पर हजारों विष्णु, शंकर एवं ब्रह्मा भी तुम्हें नहीं बचा सकते। हनुमान जी केवल दंड का उपदेश ही नही देते अपितु अतुलित बल के स्वामी जगदीश्वर श्री राम के दूत या अतुलित बल के धाम होने के कारण दंड का प्रयोग कर लंका विध्वंस भी कर डालते हैं। रामदूत की चतुरता इसी में है कि वह दंड नीति के प्रयोग के पूर्व ही विभीषण से अपने पक्ष की बात कहलवाकर रावण के मन में भेद नीति का बीजारोपण कर देते हैं।
इस प्रकार मतिमान हनुमान एक ही स्थान एवं समय में चारों नीतियों का प्रयोग कर चाणक्य शब्द को वास्तविक अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।
देखें-
1- बिनती करउँ जोरि कर रावन।
    सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।( साम नीति)

2- राम चरण पंकज उर धरहु।
   लंका अचल राज तुम्ह करहूं।।
(दाम नीति)

3- संकट सहस विश्नु अज तोहि।
    सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
               अथवा 
    उलट-पुलट लंका सब जारी।
    कूद परा पुन सिंधु मझारी।।
(दंड नीति)

4- नाय सीस करि विनय बहूता।
    नीति विरोध न मारिअ दूता।।
    आन दंड कछु करिअ गोसाईं।
    सवहीं कहा मंत्र भल भाई।।
(भेद नीति)

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