रविवार, जनवरी 2

आठवीं कक्षा का छात्र खुद लिखता व बांटता है अखबार

                                                 लखनऊ। आपने आमतौर पर 12 साल की उम्र के बच्चों को अखबारों के कार्टून वाला पन्ना पढ़ते देखा होगा, लेकिन उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का एक किशोर इसी छोटी उम्र में सामाजिक मुद्दे उठाने वाला एक अखबार निकाल रहा है। इस अखबार का वह न सिर्फ संपादक है, बल्कि संवाददाता, प्रकाशक और वितरक [हॉकर] भी है। इलाहाबाद के चांदपुर सलोरी इलाके की काटजू कालोनी में रहने वाला उत्कर्ष त्रिपाठी पिछले एक साल से हाथ से लिखकर 'जागृति' नामक चार पृष्ठों का एक सप्ताहिक अखबार निकाल रहा है। वह ब्रज बिहारी इंटर कालेज में आठवीं कक्षा का छात्र है। उत्कर्ष ने बताया कि मैं अखबार के लिए खबरों को एकत्र करने से लेकर उसका संपादन, प्रकाशन और यहां तक कि वितरण तक की जिम्मेदारी खुद उठाता हूं। मजेदार बात यह कि दूसरे अखबारों के पाठकों की तरह 'जागृति' के पाठकों को अपने सप्ताहिक अखबार के लिए एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। उत्कर्ष सबसे पहले हाथ से पाठ्य सामग्री को लिखकर अखबार के चार पन्ने तैयार करता है और बाद में उसकी फोटो कापी करवाकर उसकी प्रतियां अपने पाठकों तक पहुंचाता है। वर्तमान समय में जागृति के विभिन्न आयु वर्ग के करीब 150 पाठक हैं। उत्कर्ष ने बताया कि जागृति के पाठकों में मेरे स्कूल से सहपाठी, वरिष्ठ छात्र, शक्षिक और पड़ोसी शामिल हैं। पढ़ाई के बीच अखबार के लिए समय निकालने के बारे में पूछे जाने पर वह कहता है कि मेरा मानना है कि अगर आपके मन में किसी काम का जुनून है तो आप कितने भी व्यस्त हों, थोड़ा समय निकाल ही लेंगे। उत्कर्ष के मुताबिक उसने अखबार का नाम 'जागृति' इसलिए रखा, क्योंकि उसका मिशन लोगों को उनके हितों के प्रति जागरूक करना है, जो उन्हें प्रभावित करते हैं। वह अखबार के संपादकीय पन्ने पर भ्रूणहत्या, पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों को नियमित उठाने का प्रयास करता है। इसके अलावा अखबार में जनकल्याणकारी योजनाओं एवं बच्चों के कल्याण के लिए सरकारी नीतियों के बारे में जानकारी दी जाती है। इसमें प्रेरणात्मक लेख होने के साथ प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, कलाकारों, राजनेताओं की सफलता की कहानियां भी होती हैं। उत्कर्ष के मुताबिक वह हर रोज एक घंटा अखबार के लिए समय निकालता है, जिसमें मुद्दों को ढूंढ़ना और तय करना, दैनिक अखबारों, साप्ताहिक ्पत्रिकाओं और इंटरनेट से ज्ञानवर्धक सूचनाएं एकत्र करता है। रविवार के दिन उसे अखबार के लिए ज्यादा समय मिल जाता है। उस दिन वह विभिन्न लेखों के लिए तस्वीरें एकत्र करता है
साभार :- यश भारत जबलपुर  : क्लिक कीजिये पुष्टि हेतु
miniature newspaper pins-front pages (man on moon)

14 टिप्‍पणियां:

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

क़ाबिले-तारीफ़...उत्कर्ष त्रिपाठी को शुभकामनाएं...इस जानकारी को बांटने के लिए आपका आभार...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

गजब,कमाल..

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत ही अच्छा....
*गद्य-सर्जना*:- जीवन की परिभाषा (आत्मदर्शन)

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर काम कर रहा हे यह बच्चा, धन्यवाद इस समाचार को हम तक पहुचाने के लिये

Darshan Lal Baweja ने कहा…

बहुत सुंदर काम कर रहा हे यह बच्चा, धन्यवाद इस समाचार को हम तक पहुचाने के लिये

Archana Chaoji ने कहा…

ऐसे बच्चों से बहुत कुछ सीखना है हमें....आभार आपका

दीपक 'मशाल' ने कहा…

shaabaash

केवल राम ने कहा…

ऐसी प्रतिभाएं समाज को नयी दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं ..और आप ऐसी प्रतिभाओं को सामने लाते हैं ...बहुत प्रेरणादायक ...शुक्रिया

केवल राम ने कहा…

आपको नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें..देर से पहुँचने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ आशा है यह नव वर्ष आपके जीवन में ढेर सारी खुशियाँ लेकर आएगा ..शुक्रिया .

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

shaabaash

राजकुमार ग्वालानी ने कहा…

गाजियाबाद से एक यलो एक्सप्रेस चल रही है जो आपके ब्लाग को चौपट कर सकती है, जरा सावधान रहे।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत प्रेरणादायी व्यक्तित्व है।उत्कर्ष त्रिपाठी को बहुत बहुत बधाई आशीर्वाद।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

ishwar kare har bachche me yahi jajba ho!

Priti Krishna ने कहा…

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !

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