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रविवार, अप्रैल 3

वेब रिपोर्टिंग एवं ई-मेल के कड़वे अनुभव


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अपनी माटी एक अच्छा पठन योग्य वेब पोर्टल है . 


आजकल कुछ ऐसे रिर्पोटर्स देखने को मिलेंगे जो  चाहते हुए भीं आप के मेल पते पर ऊल-जुलूल किस्म की खबरें भेजते हैं। शायद ऐसाकरना उनकी आदत है जो एक ‘ड्रग एटिक्ट’ की तरह कई मेल आई0डीपर एक साथ अपने वाहियात ‘आर्टिकल्स’ भेजते हैं। हाई प्रोफाइलकहलाने के चक्कर में ब्लाग/फेसबुक आदि इत्यादि वेब स्पेस पर अपनी सिरदर्द जैसी बकवासों को लिखने/चैटिंग करने वालों से एक तरह सेएलर्जी’ हो गई है। इन्टरनेट की सेवा प्रदान करने वालों ने थोड़े से पैसों में असीमित डाउन/अपलोडिंग की सुविधा दे रखा है सो वेब का बेजाइस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों की भरमार हो गई है। इन लोगों ने इन्टरनेट को मजाक सा बना लिया है।

कुछेक कथित लेखकों ने हमें भीं अपने लेख/न्यूज आदि मेल करना शुरू कर दिया। खीझ होने लगी थीयह कहिए कि ऐसे लोगों से एलर्जीहोने लगी। सैकड़ों मेल आई.डीपर भेजे गए इन तत्वों के ‘आलेख’  तो सारगर्भित होते हैंऔर  ही प्रकाशन योग्य। हमने अपने सहकर्मीसे कहा कि रिप्लाई आल करके ऐसे लोगों को ताकीद कर दो कि आइन्दा बेवजह मेल बाक्स में ‘वाहियात’ आलेख  भेजें। कोई दिल्ली के हैं,उन्होंने काल करके कहा कि वह ऐसा इसलिए करके हैं ताकि गरीब लोग जो वेब साइट्स/न्यूज पोर्टल की तरह संचालित कर रहे हैंउन्हेंमुफ्त में न्यूज (खबरेंमिल जाएँ। उनकी बातें सहकर्मी ने सुनी और कुछ बताया। हँसी आई फिर मानव होने की वजह से दुर्गुण रूपी गुस्साभी आया। कहा वह बेवकूफ है। पहले तो इसे छपास रोग थाजब छपने लगा तब आल पर मेल करने लगा। यह सोचकर कि वह वेब पोर्टलचलाने वाले आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को फ्री में खबरें दे रहा है। इसी तरह कईयों के मेल्स आते रहते हैं।

मानव हूँ गुस्सा तो आएगा ही। सहकर्मी से कहा कि लिख दो कि फार  गॉड सेक अब इस तरह के मेल सेन्डिंग बन्द करें। सहकर्मी नहींसमझ पाये उन्होंने ‘रिप्लाई आल’ कर दिया। जाहिर सी बात है कि जिनसे हमारा किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है वे गुस्सा तो करेंगे ही।एक छोटी सी त्रुटि ने कई लोगों के ‘ईगो को हर्ट’ किया। उनके रिटर्न मेल्स आएजिनमें सभीं ने अपने-अपने तरीके से मुझे भला-बुरा कहाथा। मैने महसूस किया कि पत्रकारिता से सम्बद्ध लोगों में स्वाभिमान के स्थान पर दर्प यानि घमण्ड कुछ ज्यादा हैवह भी ऐसे लोगजिन्होने दो हजारपाँच हजार खर्च करके अपनी वेब साइट्स बना लिया है उनके तो रूतबे का कोई सानी नहीं।

बहरहाल मैं क्या गुस्सा करूँ। मैं तो बस इतना ही कहुँगा कि कभीं-कभी ऐसे लोगों से पाला पड़ जाता है जिनकी वजह से हमारी रिप्लाई सेएक से एक योद्धा तलवारें भाँजने लगते हैंजिन्हें युद्ध के मैदान में जंग लड़ने का तरीका ही नहीं मालूम।  इस इलेक्ट्रॉनिक युग में अमेरिकीराष्ट्रपति को प्रेषित मेल गलती से किसी अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष को मिल जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। आपा  खोया करें मैंने भी प्रिण्टमीडिया में अब तक अपनी सेवाएँ देते हुए 37 वर्ष पूरे कर लिए हैं। तब  तो इसकी पढ़ाई थीऔर  ही मास कम्युनिकेशन का प्रशिक्षण जोपढ़ना-लिखना जानता था वहीं सिकन्दर होता था। आप वेबसाइट संचालित करते हैंयह आप के लिए गौरव की बात हो सकती है। हम भीअपना अखबार निकालते हैंऔर वेब पोर्टल ऑपरेट करते हैंशौकिया। रही बात चैटिंग या फिर नए तकनीक से संवाद करने की तो वह मुझेनहीं मालूम।

इन्टरनेट ऑपरेट करने के लिए सहयोगी की मदद लेता हूँ। सहयोगी से चूक हो जाए तो जाहिर सी बात है कि वह गलती मेरी ही मानीजाएगी। लेकिन आप तूफान सिंह हों या चक्रवात मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी ‘बैतालके नाम से अपनी ‘युवावस्था’ मे चर्चित पत्रकारहुआ करता थालेकिन तहजीब और एखलाक को ताक पर नहीं रखा लेागों के बीच सम्मानित ढंग से स्थान पाता था। अब भीं पाता हूँ। आजतो मेट्रोसिटी में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले भी सपना ‘मक्का’ का देखते हैं। हमारे यहाँ कहावत है कि ‘‘रहैं भरसाएँ में और देखै सपनामक्का कै’’ मैं आप को नहीं कह राह हूँ। अब मैं इस कहावत से भी इनकार नहीं कर सकता कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका यदि आप की मेलआई0डीपर रिप्लाई आल के क्रम में कुछ मेरी तरफ से भेजा गया हो जिससे आप का ‘ईगो हर्ट’ हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँक्योंकि मैं ‘अकारण’ किसी शरीफ को दिल नहीं दुखाना चाहता। आप से भी अपेक्षा करता हूँ कि जो लोग अपने मेल्स सेण्ड आल करकेबकवास’ भेजते हैं उन्हें नसीहत जरूर दें। अनजाने में हुई गलती के लिए एक बार फिर क्षमा चाहूँगा। फिलवक्त बस इतना ही। 

भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
अम्बेडकरनगर

सम्पर्क नम्बर- 09454908400
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