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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कोशिशें सदा बड़ी ही होतीं हैं..!

    जन्मपर्व पर हार्दिक बधाई             बेटी शिवानी एफिल टॉवर, हिमालय, एवरेस्ट, या और अनंत ऊँचाईयाँ कभी भी बड़ी नहीं ...! बड़ी होती हैं... उम्मीदें...  अरे नहीं यह भी नहीं ! बड़े होते हैं संकल्प..! ओह..  ये भी आधा अधूरा सच है..! बड़ी होती हैं.. सफलताएं .. उफ़ ये क्या ? यह तो आधे से भी कम सच है बड़ी होतीं हैं.. कोशिशें..!  जो हज़ारों रिजेक्शन के  बाद    सतत संलग्नता   सफल बनातीं हैं हाँ... सकारात्मक दिशा  की कोशिशें सदा बड़ी ही होतीं हैं जन्मपर्व पर हार्दिक बधाई शिवानी बेटा..!

मेरी फुदक चिरैया का हत्यारा माओ

  18 मार्च 1958 से 18 मार्च 1960 तक एक मूर्ख नेता ने मेरी फुदक चिरैया का सामूहिक हत्या का अभियान छेड़ दिया इस मूर्ख नेता का नाम था माओ ।     यह एहसान फरामोश अति स्वाभिमानी और अपने कैलकुलेशंस को श्रेष्ठ मानने वाला नेता था। पता नहीं क्यों इस भटके हुए संहारक मस्तिष्क में एक गणित उभरा और वह गणित था देश की अर्थव्यवस्था को यूरोपियन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था से बेहतर बनाना। यह जिस आईडियोलॉजी से आता है उस आईडियोलॉजी में मौलिक रूप से यह विचार समाहित होता है कि अगर कुछ हुआ है... तो उसका उत्तरदाई बिना कोई अवश्य है ।  बस एक दिन बैठे बैठे गुणा भाग करते हुए इसने अंदाज लगाया-" यह जो गौरैया है ना साल भर में  4•5 किलोग्राम अनाज चट कर जाती है । और चूहे भी अनाज चट कर जाते हैं अगर हम इन चिड़ियों को मार दें तो  बहुत सा अनाज बचेगा और वह अनाज बाजार में बेचकर अर्थव्यवस्था को पुख्ता किया जा सकता है । कैलकुलेशन सही था लेकिन परिणाम के बारे में सोचा ही नहीं गया। मेरी फुदक चिरैया उन कीट पतंगों को भी चट कर जाती है जो माओ के देश के खेत में फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। और वह इस बात का भी अंदाज नह

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सार्वकालिक समरसता के तत्व..!

      छायाकार : मुकुल यादव "भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सार्वकालिक समरसता के तत्व..!"     सुप्रभात श्री राम कृष्ण हरि भारतीय सामाजिक व्यवस्था को इस बात से घबराने की जरूरत नहीं है कि भविष्य में कोई भी संस्कृति उस पर हावी हो जावेगी। इस कथन पढ़ने जा सुनने के बाद आप चकित हो जाएंगे आपको विश्वास नहीं होगा आप कहेंगे इससे बड़ा मिथ्या कथन और कुछ नहीं की हमने अपनी जीवनशैली को बदल दिया है इसके बावजूद यह दावा किया जा रहा है कि -" कोई अन्य संस्कृति हमारे जीवन पर प्रभाव कारी नहीं होगी ..?"    अगर आप यह समझते हैं कि कपड़े पहनने बोलचाल अथवा जीवन शैली में परिवर्तन किसी अन्य संस्कृति का प्रभाव है तो आप गलत समझते हैं क्योंकि यह सांस्कृतिक बदलाव का आधार नहीं है ना ही यह मानक हैं और न ही संस्कृति के प्रतीक है ।    अब अंदाज कीजिए कि अगर शिकागो में वहां के जाने से बचने के लिए विवेकानंद कोट नहीं पहनते और वही ठंडे सूती वस्त्र पहनते तो क्या विवेकानंद सनातन संस्कृति के विभिन्न बिंदुओं को सबके सामने रख सकने में समर्थ थे ?   कदापि नहीं ,  वे बीमार हो जाया करते थे जाड़े के प्रभ

The Importance of the Ramayana in Human Civilization : Anant Buddh Chaitanya

【 spiritual speech delivered by Swami Anand Bodh Chaitanya Indonesia Jakarta please this is introductory post this blog you can also visit Swami Anant both Chaitanya ' blog for his latest public communication】 I feel proud and glorified to talk about Ramayana, the oldest epic in the world history of literature. According to the Indian system of counting, time is divided into four ages - the Satyuga, Tretayauga, Dwapara Yuga and Kali Yuga. Kali Yuga consists of 432 000 years,  Dwapara 864 000 years, Treta Yuga 1.296 million years and Satyuga has 1.728 million. The calculation time of the Ramayana is minimum 870 000 years (5250 to the present Kali Yuga Dwapara bygone era year 864 000 years) is proven. Some scholars interpret Ramayana was written 8000 BC, which means it, is baseless. Other scholars believe even older. The great kind-hearted saint vividly described all aspects of human civilizations. This knowledge is bound to be enriched by its philosophical, i

वीरांगना दुर्गावती : आनंद राणा

【प्रोफेसर आनंद राणा       इतिहासकार जबलपुर 】 "चंदेलों की बेटी थी,गोंडवाने की रानी थी..चण्डी थी रणचण्डी थी, वह दुर्गावती भवानी थी"- "शौर्य +स्वाभिमान +स्वतंत्रता और प्रबंधन की देवी - गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी वीरांगना रानी दुर्गावती के अवतरण दिवस पर शत् शत् नमन है" 🙏 🙏वीरांगना रानी दुर्गावती का शासन महान् गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग था 🙏अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय जी के निर्देशन में +अनुसंधान दल के अध्यक्ष रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के यशस्वी कुलपति प्रो कपिल देव मिश्र जी +क्षेत्रीय संगठन मंत्री मध्य क्षेत्र डॉ. हर्षवर्धन सिंह तोमर जी +प्रो. अलकेश चतुर्वेदी जी शा. महाकोशल महाविद्यालय  एवं कार्यकारी अध्यक्ष श्री नीरज कालिया के मार्गदर्शन में इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत के झरोखे से वीरांगना रानी दुर्गावती के गौरवमयी इतिहास की संक्षिप्त गाथा (चित्र क्र. 3  वीरांगना के सेनापति अधार सिंह (सिंहा) के वंशज महान् चित्रकार राममनोहर सिंहा जी का है जो वीरांगना रानी दुर्गावती के शस्त्र पूजन का है

आओ खुद से मिलवाता हूँ..! भाग 07

           उस दिन रेल मिनिस्टर माधवराव सिंधिया जी जबलपुर आए थे हां तिथि  याद नहीं है और सुबह 10:00 बजे का वक्त था हमने भी अपना एक आवेदन सर्किट हाउस में नौकरी के वास्ते उनको टिपा दिया । उस आवेदन का क्या हुआ किसे पता ऐसे सैकड़ों आवेदन आते रहते हैं डीआरएम ऑफिस के किसी एपीओ के चेंबर तक में भी पहुंचा कि नहीं ऊपरवाला जाने । सुना था नौकरी क्लर्कशिप आसान थी मिलना जुगाड़ हो तो। बाबूजी के पास कितने जुगाड़ थे या नहीं ये भी ईश्वर जाने पर बाबूजी खुद के बूते अर्जन को श्रेष्ठ समझते हैं । वे कहते थे -"स्टेशन मास्टर्स के बच्चे कुली कबाड़ी बनते हैं । तुम लोग मत बनना रे..।      हमने भी चाहे अनचाहे उनकी बात को रखा । क्लास फोर्थ में जॉब तो चाहिए ही न था । फिर एक दबाव टायपिंग सीखने का आया वो मेरी रुचि का न था । सतीश भैया ने क्लास जॉइन की पर जब वे टायपिंग क्लास जाते तब मेरा नर्म गर्म बिस्तर पर सोने का वक़्त होता था 7 बजे सुबह बिस्तर से उठना तब तक भाई टायपिंग का बहुत सारा हिस्सा सीख लेते होंगे । खैर जो भी हो बिना एक्सट्रा हुनर के अपने राम की ज़िंदगी कविता साहित्य छात्र राजनीति में उलझी रही । स्व

सांस्कृतिक आंदोलन : बनाम अभिशप्त गन्धर्व..!

                       सूरदास की आवाज इकतारे की टुनटूनाहट  के साथ भेड़ाघाट के धुआंधार के रास्ते पर जब भी गूंज उठती है तो लगता है कि कोई गंधर्व उतर आया हो इस जमीन पर। बहुत से सांस्कृतिक पुरुष ने करते हैं इसी रास्ते से जलप्रपात के अनित्य सौंदर्य का रसास्वादन करें। निकलते हम भी हैं तुम भी हो ये भी हैं वह भी हैं... यानी हम सब सूरदास यहीं से निकलते हैं। उसके बिछाए बोरी पर कुछ सिक्के डाल देते हैं।     उस सूरदास को हम सूरदास बहुत देते हैं केवल उसे कलाकार होने का दर्जा कभी नहीं देख पाए हम जो सूरदास ठहरे ।   सुना है सांस्कृतिक विकास जोरों पर है। लोक कला लोक संस्कृति की कृतियाँ शहर के  विद्यार्थी उनसे सीख लेते हैं और हो जाता है कोई सांस्कृतिक सम्मेलन सुनते हैं आमंत्रित करती है सरकार  आवेदन राशि भी आवंटित करती है फाइलों के पीछे के चेहरे देखे बिना ।      बहुत कम होता है कि सूरदास को सरकारी तौर पर कलाकार माना जाए जैसा पंडवानी की गायिका तीजन पहचान पा सकी ।       सर्वहारा के लिए सांस्कृतिक आंदोलन बहुत जरूरी है  . मुझे लगता है जरूरी यह है कि उन तक पहुंच जाए पर मुश्किल है ना सूरदास के पास ल

भारतीय योगा की नाव : पतवार डॉलर और यूरो की...!

मेरे एक परम सम्मानीय मित्र स्वामी अनंत बोध चेतन इन दिनों लिथुआनिया मैं योगा स्टूडियो चला रहे हैं । दो विषय में स्नातकोत्तर डिग्री और योग तथा दर्शन में पीएचडी अंग्रेजी संस्कृत हिंदी के जानकार स्वामी अनंतबोध चैतन्य भारत से 6000 किलोमीटर दूर लिथुआनिया में सनातन की धारा को जीवंतता दे रहे हैं। लिथुआनिया के बारे में जान लीजिए ... कभी इतिहास में एक बड़ा देश हुआ करता था यूएसएसआर शामिल लिथुआनिया 1990 की सोवियत संघ की टूटने पर सबसे पहले आजाद हो गया । पूर्वी यूरोप का इस देश की आबादी लगभग 29 लाख है साथ हीी देश अब यूरोपीय यूनियन का तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था वाला देश है। इस देश को बाल्टिक टाइगर भी कहा जाता है। स्वामी अनंत बोध बताते हैं कि वे सनातन संस्कृति के विस्तार के लिए  लिथुआनिया में है जहां भारतीय हिंदुओं की संख्या  लगभग दशमलव 0•06% है। इस देश में इंटरनेट सिस्टम सबसे तेज है और यहां सभी नागरिक इंटरनेट की यूजर हैं।     सांसद ( योनोवा ) Eugenijus Sabutis के साथ योगी अनन्त बोध संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से  पीएचडी की डिग्री

कविता कब लौटेगी, बीते दिन की मेरी तेरी राम कहानी ।।

वो किवाड़ जो खुल जाते थे,  पीछे वाले आंगन में गिलकी लौकी रामतरोई ,  मुस्कातीं थीं छाजन में । हरी मिर्च, और धनिया आलू, अदरक भी तो  मिलते थे- सौंधी साग पका करती थी ,  मिटटी वाले बासन में ।। वहीं कहीं कुछ फुदक चिरैया, कागा, हुल्की आते थे- अपने अपने गीत हमारे,  आँगन को दे जाते थे ।। सुबह सकारे दूर कहीं से  सुनके लमटेरों की  धुन जितना भी हम समझे  दिन  भर राग लगाके गाते थे ।।  कुत्ते के बच्चे की कूँ कूँ,  तोते ने रट डाली थी चिरकुट बिल्ली घुस चौके में,  दूध मलाई खाती थी । वो दिन दूर हुए हमसे अब,  नैनों में छप गई कथा चने हरे भुनते, खुश्बू से ,  भीड़ जमा हो जाती थी ।। गांव पुराने याद पुरानी,  दूर गांव की गज़ब कहानी । कब लौटेगी, बीते दिन की  मेरी तेरी राम कहानी ।। शाम ढले गुरसी जगती थी,  सबके घर की परछी में- दादी हमको कथा सुनाती,  एक था राजा एक थी रानी ।। गिरीश बिल्लोरे मुकुल

मानसिक संवाद एक रहस्यमयी घटना भाग -दो

अचानक एक रात वही बेचैनी से जिसे उसकी पत्नी अनिद्रा रोग कहती थी से खुद को बिस्तर पर रोक न सका । थोड़ा बहुत कोशिश की कि नींद आ है पर संतोष को नींद न आई । स्लीपिंग पिल्स लेता न था कि वह सो जाता । पूरी रात करवटें बदलता इससे उम्दा तरीका यह था कि वह अब बस जागता रहे पर क्या करता शरीर अजीब से उत्पीड़न से निढाल सा होने लगा कि अचानक लैंडलाइन पर घण्टी बजने से उसकी वेचैनी और बढ़ गई । फोन पर बात न हो सकी । उन दिनों मोबाइल फोन न था । सो संतोष अल्ल सुबह गांव निकला उसे लगा शायद घर जाकर कुछ शांति मिले ?   विचारों में घुलनशील हो रहीं कुशंकाएं उसको भयंकर परेशानी में डाल रहीं थीं । शहर से गांव की दूरी कम न थी । 150 किलोमीटर दूर आवागमन के संसाधनों में अनिश्चतता की संभावना के चलते उसने मित्र से उन दिनों चलने वाली लूना उधार ली । फुल टैंक फ्यूल और अलग से दो लीटर कुप्पी में पेट्रोल डलवाकर गांव पहुंचा ।  घर के आंगन में पिता की अर्थी देख सब कुछ साफ होने लगा था कि उसे कौन तेज़ी से याद कर रहा था। चाचा ने बताया बीती रात जब पिता मृत्यु शैया पर थे तो तुमको बहुत याद कर रहे थे।  संतोष के कज़िन ने उसे पोस्टमास्टर

मानसिक संवाद एक रहस्यमयी घटना भाग -एक

रहस्य रोमांच और आध्यात्म आप संवाद कर सकतें हैं बिना किसी उपकरण के हज़ारों मील दूर  आश्चर्य हो रहा है ना कि आप से यह कहा जा रहा है कि हजारों किलोमीटर दूर बिना किसी यंत्र के संवाद कर सकते हैं। जी हां यह यथार्थ है और संभव भी कि आप अपने से हजारों किलोमीटर दूर ऐसे लोगों से संवाद कर सकते हैं जिनको नाम जानते हो ना ही आपका उनसे कोई परिचय हो।    यह प्रक्रिया इस घटना से समझी जा सकती है घटना साई बाबा के जीवन से जुड़ी है एक समय की बात है कि साईं बाबा मस्जिद में बैठे हुए अपने भक्तों से वार्तालाप कर रहे थे| उसी समय एक छिपकली ने आवाज की, जो सबने सुनी और छिपकली की आवाज का अर्थ अच्छे या बुरे सकुन से होता है| उत्सुकतावश उस समय वहां बैठे एक भक्त ने बाबा से पूछा - "बाबा यह छिपकली क्यों आवाज कर रही है? इसका क्या मतलब है? इसका बोलना शुभ है या अशुभ?" बाबा ने कहा - 'अरे, आज इसकी बहन औरंगाबाद से आ रही है, उसी खुशी में यह बोल रही है " उस भक्त से सोचा - 'यह तो छोटा-सा जीव है..! उसी समय औरंगाबाद से एक व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर बाबा के दर्शन करने आया ।  बाबा उस समय नहाने गये

पहाड़ पर लालटेन थे मंगलेश डबराल

आजादी के  1 साल बाद 16 मई  1948 को जन्मे मंगलेश डबराल का जन्म टिहरी गढ़वाल प्ले हुआ और आज 9 दिसंबर 2020 को मंगलेश जी  परम यात्रा पर निकल गए। मंगलेश डबराल को भाषित करने के लिए यह वक्त नहीं है लेकिन उनके मोटे तौर पर किए गए कार्य की चर्चा करना जरूरी है। उनके 1981 में कविता संग्रह पहाड़ पर लालटेन घर का रास्ता 1988 तथा हम जो दिखते हैं 1995 आवाज भी एक जगह है नए युग में शत्रु यह । मंगलेश डबराल जी को ओमप्रकाश स्मृति सम्मान 1982 श्रीकांत वर्मा सम्मान 1989 साहित्य अकादमी का पुरस्कार 2000 प्राप्त हुआ है खास यह बात थी कि ऐसी कोई खबर इनके जीवन वृत्त में  दर्ज नहीं है कि उन्होंने असहिष्णुता पूर्व सम्मान को लौटाया हो। मंगलेश डबराल  के एक कविता संग्रह है आवाज भी एक जगह है का इटली भाषा में अनुवाद अनखीला वह चाहिए उन लोगों को तथा अंग्रेजी में 20 नंबर डज नॉट एक्जिस्ट प्रकाशित हुई डबराल जी  के दो कविता संग्रह 2 भाषाओं में अनुवाद किए गए किंतु खुद डबराल जी ने पाब्लो नेरुदा के अलावा आधे दर्जन से अधिक लोगों की कविताएं अनुवादित की आइए आज हम उनकी कृति पहाड़ पर लालटेन की कविता लेते हैं अत्याचारी की थक

WhatsApp DP | Short Film | Indie Routes Films | Reaction YouTube film

##WhatApp_DP By Indie Routes Films  Staring *ing Abha Joshi #Ravindr_Joshi मर्मस्पर्शी यूट्यूब वीडियो है .  यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि रोजगार के लिए यात्रा करनी पड़ती है । भारत से पिछले 25 वर्ष में बहुत सारे बच्चे विदेशों में गए। इन बच्चों की वापसी अब असंभव है। आपके पूर्वज एक ही पहले पिता माता जब गांव से शहर आए तो वापस फिर कभी नहीं गए उन गांवों में जहां उनके जन्म के नाम के लड्डू बांटे गए थे। उसके बाद आपके बच्चे मेट्रो दिल्ली मुंबई गुड़गांव चेन्नई पुणे हैदराबाद यानी भाग्यनगर में साइबर मजदूरी करने लगे तो वे भी वापस आने में आनाकानी कर रहे हैं।मेट्रो से निकलकर अमेरिका, कैनेडा  आस्ट्रेलिया  इंग्लैंड इटली जर्मनी फ्रांस नीदरलैंड, आदि  देशों में गए हैं वे क्या खाक आपका कस्बा नुमा शहर जबलपुर जैसे शहरों को पसंद करेंगे जहां आज भी गाने गा गा कर कचरा इकट्ठा किया जा रहा हो। इस फिल्म में एक डायलॉग है वहां इंडियन डायसपोरा केवल अपने ही हुजूम के साथ रहता है। उसे उस देश की आबादी में स्वीकार्य नहीं किया है। 10 से  15 साल पहले वैश्वीकरण के उपरांत पड़ने वाले प्रभाव को टेक केयर नाटक में बखूबी प्रदर्शित किया

अन्नदाता कृषक भी भारतीय नागरिक है

कृषि कार्य में उन्नत तकनीकी अजमानी की जोखिम बहुत कम किसान उठा पाते हैं चित्र में हरदा जिले के कृषक श्री राजेंद्र गुहा अपने एमबीए किसान पुत्र के साथ नजर आ रहे हैं  वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन ने भारत सहित 164 देश संधिबद्ध हैं..!       मित्रों मैं किसान आंदोलन के प्रारंभिक दिनों से ही आंदोलन को फॉलो कर रहा हूं। किंतु उसके पहले आपको बता दूं कि WTO एवम विश्व व्यापार पर भी निरंतर मेरा अध्ययन जारी है ।          विश्व व्यापार संगठन  के 1 जनवरी  1995 के पूर्व  विश्व व्यापार का रेगुलराइजेशन आपसी अस्थाई समझौता के तहत हुआ करता था । इसे सामान्य समझौता ट्रेड एवं टैरिफ कहा जा गया था। अंग्रेजी में इसे general agreement on trade and tariff संक्षेप में  GATT  कहा गया जो सन 1986 से 94 प्रभावी रहा । इस पर आधारित समझौते अस्थाई और अनुबंध तोड़ भी दिए जाते थे और इसी कारण से विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गई जिसे हम डब्ल्यूटीओ के नाम से जानते हैं डब्ल्यूटीओ अति महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो विश्व मैं व्यापारी व्यवस्था को विनियमित यानी रेग्युलेट  करती है।  आइये हम चर्चा करते