सोमवार, नवंबर 28

देश का कालाधन देश में : आर्थिक विमर्श 1


करेंसी के बंद होने या कहें सरकार द्वारा बंद करने के बाद की परिस्थियां ऐसी क्यों हैं कि जनता कष्ट भोगने के बावजूद भी सरकार के साथ कड़ी है. ?
ऐसा लगता है जनता को बेहद भरोसा है और  उम्मीद भी है कि सरकार का हर कदम जनोन्मुख है. सरकार की यह कोशिश आर्थिक विषमता को दूर करेगी. प्रथम दृष्टया दिख भी यही रहा है. अपने बिस्तर के नीचे नोट बिछा कर गर्वीली नींद सोने वालों के लिए- “मेरे प्यारे देशवाषियों” से प्रारम्भ होने वाला भाषण भयावह लग रहा होगा पर गरीब व्यक्ति निम्न और उच्च मध्यवर्ग का व्यक्ति दाल-रोटी के साथ  बिना सलाद खाए चैन की नींद सो रहा है.  चिल्लर के अभाव में  जाड़े के दिनों में मूली-अमरूद के सलाद का जुगाड़ जो नहीं हो पा रहा ... जब स्व. राजीव जी ने कहा था – “हम एक रुपये भेजते हैं आप तक पंद्रह पैसे पहुंचाते हैं तो बड़ा प्रभावित थी जनता तो एक दिन का उपवास भी तो रखा था स्व. शास्त्री जी की सलाह पर... !”
यानी इस देश की जनता जब किसी को प्रधान-मंत्री जी बनाती है तो विश्वास की डोर से खुद-ब-खुद बांध जाती है उस व्यक्तित्व से ..! इसी तंतु के सहारे देश का प्रजातंत्र बेहद शक्तिशाली नज़र आता है.
भारतीय जनमानस नें लोकपाल आन्दोलन के दौर में अन्ना में अपना कल देखा था ... पर अन्ना जी सियासी न थे न ही उनकी मंशा थी .. पर जनता उनको देश की समान्तर अर्थ-व्यवस्था को ख़त्म करने का जिम्मा सौंपने का मन बना चुकी थी. पर क्या हुआ इस पर कुछ कहना ज़रूरी नहीं क्योंकि मुझे सामाजिक नज़रिए से अपनी बात कहनी है. तो हाँ चलें मुख्य विषय की ओर..
1.   “भारत की अर्थ-व्यवस्था में सेंधमारी से सरकार खुद हलाकान हैं खुदरा बाज़ार में मूल्यों की रोजिया घटबढ़ आम आदमी के लिए घातक जो है” ....
2.   फेक करेंसी की वज़ह से आतंक का विशाल साम्राज्य दूसरा प्रमुख कष्ट प्रद घटक है..
3.   स्थावर संपदा व्यापार ने तो आतंकी स्वरुप ले लिया है
4.   शिक्षा-स्वास्थ्य एवं आधारभूत ज़रूरतों का अधिक महँगा होना
5.   भ्रष्टाचार की विकरालता
  देखा जाए तो 1000 और 500 के नोट हमेशा हमें डराते रहे थे कार में पैट्रोल डलवाते वक्त जब पम्प वाला सूरज की तरफ मुंह कर नोट चैक करता तो हम ईश्वर से याचना करते थे कि मेरा दिया नोट नकली न निकले . भले ही हम उसे एटीएम से निकाल कर लाते पर सत्य यही था कि 1000 और 500 के नोट में सर्वाधिक भय इसी बात का होता था.
बाज़ार पूर्ण रूप से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि किसी ऐसे तानाशाह के हाथ है जो जब जी चाहा मूल्य बढ़ा दिया जब चाहा घटा दिया अर्थात अधिक लाभ के लिए कृत्रिम कमी को षडयंत्र पूर्वक रचा जाता है. अब जब खुदरा बाज़ार में  माल बेचते रहना मज़बूरी है तो ये मानिए कि मूल्यों में स्थिरता दीर्घ समय तक बनी रह सकती है. अब व्यापारी एकजुट होकर “खुदरा वस्तुओं के स्टाक को बलात बंधक बनाने से डरेगा”  इसका अर्थ यह है कि अब उसे उत्पादन को रोक अपने लाभ के प्रवाह को रोकने से कोई अतिरिक्त फायदा न होगा ! ऐसी स्थिति में उसकी मज़बूरी है कि वो उत्पाद को बाज़ार में प्रवाहित होने से न रोके.
फेक करेंसी आतंक को कितना पालपोस रही थी सब जानते हैं . इसका असर खुदरा बाज़ार पर भी था. जो एकाएक बाधित हुआ.
तीसरा महत्वपूर्ण बाज़ार स्थावर संपदा व्यापार  का है जिसका अधिकाँश भाग  कर चोरी से अर्जित धन से संचालित है. इसमें पवित्रता की ज़रुरत थी .
इन सब बातों के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है जो अनावश्यक रूप से अत्यधिक महंगी है
 भ्रष्टाचार भी कालेधन के निर्माण का प्रमुख स्रोत है .
इन सब बिन्दुओं पर विचार किया जाए तो लगता है कि नोटबंदी में बुराई क्या है .. ?
जब मैंने लोगों से नोटबंदी की खामियां जाननी चाहीं तो वे घुमाफिरा कर एटीम मशीन या बैंक की कतार और 50-55 लोगों की मृत्यु का ज़िक्र मात्र कर पाए किसी के पास कोई ठोस तथ्य नहीं है ... नोटबंदी के खिलाफ .. पर नोटबंदी के समर्थक भी कोई महान ज्ञानवान नहीं हैं.. कि वे क्यों समर्थक हैं ... पर उनको अपने प्रधान-सेवक पर भरोसा पक्का है.
सुधि पाठको मुझे टीवी चैनल्स पर अर्थशास्त्रियों की मौजूदगी इस वक्त अवश्य अखर रही है जो जनता के सामने अपनी बात रख जनता को इस परिवर्तन के गुण-दोष गिना सकें . चलिए 50 दिन नहीं साल भर सहयोग के लिए तैयार रहें ....... ज़रा सा कष्ट सहें कम खर्च करें ...... पूंजीवादी विकृतियों को , आतंक को समाप्त करने के संकल्प पूरा होने दें ....... देश राग यही है. हमें देश के कालेधन की होली देश में ही जलवाना है .. किसी स्विस बैंक में नहीं    



      

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