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नवंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"आज सिर्फ इतना ही ...........!"

हरेक मामले में उठाते हो अंगुलियाँ – क्या हश्र होगा आपका जो हाथ उठेंगे .. ?

मैं जाउंगा तो अश्क  के सैलाब उठेगें, झुक जाएँगी नज़रें,  कई  लोग झुकेंगे महफ़िल कभी चिराग  बिना, रौशन हुई है क्या  .....? रोशन न रहोगे तुम भी, जो चिराग बुझेंगे..!! दिल खोल के मिलिए गर मिलना हो किसी से – वो फिर न मिला लम्हे ये दिन रात चुभेंगे !! हरेक मामले में उठाते हो अंगुलियाँ – क्या हश्र होगा आपका जो हाथ उठेंगे .. ?                                 गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”   :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: पग पग पे मयकदा है हर शख्स है बादाकश बहका वही है जिसने, कभी घूँट भर न पी !! रिन्दों के शहर में हमने भी दूकान सज़ा ली इक वाह के बदले में हम करतें हैं शायरी ..!!                               गिरीश बिल्लोरे “मुकुल” :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: मसले हल हुए न थे कि, कुहराम मच गया- बदली हुई सूरत में वो    आवाम तक गया ! अक्सर हुआ यही है मेरे हिन्दोस्तान के साथ – जिसपे किया यकीं वही बदनाम कर गया .!! फिर कहने लगा चीख के,  संगे-दिल हो आप- रिश्तों तार तार कर नुकसान कर गया !! मुम्बई के धमाकों की समझ पेरिस में पा

"वेतन और मज़दूरी मत बढ़ाओ ?"

आज के भौतिकयुग में ऐसी मांग बेहूदा ही लगती होगी न । है ही बेहूदा भाई इस सोच को आप क्रांतिकारी सोच मानें भी तो क्यों ? भारतीय अर्थव्यवस्था के इर्दगिर्द जटिलताओं का जंजाल है । आज भी अर्थ व्यवस्था बची अवश्य है परंतु स्थिरता के तत्व इसमें शामिल नहीं हैं । देश का विकास व्यक्तिगत सेक्टर में सबसे अधिक असंतुलित एवं भयातुर है । वो पूंजी निर्माण में सहायक नहीं हो पा रहा इस बिंदु पर मैंने पूर्व में चिंता ज़ाहिर की थी । उसी बिंदु को विस्तार देने एक बार फिर आपके समक्ष हूँ   मित्रो देश को अधिक मुद्राओं (भारतीय सन्दर्भ में रुपयों ) की  ज़रुरत नहीं है . उससे  अधिक "फूल प्रूफ मूल्यनियतन प्रणाली" को विकसित करने की ज़रुरत है । ताकि आम भारतीय का घरेलू बजट प्रभावित न हो । किन्तु ऐसा संभव शायद ही हो इस दिशा में सोचना भारतीय अर्थविज्ञानीयो ने शायद छोड़ ही दिया है ।          बाज़ार ने लोगों की जीवन शैली के स्तर को उठाने कास्ट एनहान्स्मेंट को प्रमुखता दी है । तो कराधान की आहुति से भी कीमतों का ग्राफ में धनात्मक   बढ़ोत्तरी ही नज़र आई है । आपको एक उपयोगी खाद्य सामग्री को क्रय करने में अगर 10 रूपए खर्

ऐ शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है.....-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

मुझे लखनउ भुलाए नहीं भूलता डा भूपेन्द्र ने जो लिक्खा वो मेरे एहसासों में ज़िंदा है 20 बरस बाद भी... बेशक ख़ूबसूरत शहर ......... है    अमाँ मियाँ वह भी क्या जमाना था। जब हमारा हर छोटा बड़ा सिक्का चला करता था। आज तो चवन्नी , अठन्नी और एक रूपए के सिक्के की वकत ही नहीं रही। हम भी नखलऊ में पले-बढ़े , पढ़े , तहजीब तालीम हासिल किया। चवन्नी की एक कप चाय और तीन पत्ती पान की कीमत भी चवन्नी हुआ करती थी। एक रूपए जेब में फिर क्या था पूरा नखलऊ घूमते थे। चवन्नी में सिटी बस पूरे नउवाबी शहर का सैर करती थी , और एक कप चाय तीन पत्ती पान की गिलौरी मुँह में डाले रॉथमैन्स/ट्रिपलफाइव ( 555 स्टेट एक्सप्रेस) होंठों से लगाए धूआँ उड़ाने के बाद कुल एक रूपए का ही खर्च बैठता था। वाह क्या जमाना था वह भी। आज तो चवन्नी/अठन्नी का नाम सुनते ही दुकानदार इस कदर घूरता है जैसे किसी भिखमंगे से सामना पड़ गया हो। कुल मिलाकर यह कहना ही बेहतर होगा कि वह जमाना लद गया जब हमारा हर सिक्का चलता था। लखनऊ शहर को सलाम किए अर्सा बीत गया , सुना है कि अब नउवाबों का शहर नखलऊ काफी तब्दील हो गया है। काश! हमने शहर-ए-लखनऊ से मुहब्बत न की होती यह

मोमबत्ती से रहें सावधान : सरफ़राज़ ख़ान

पैराफिन वैक्स मोमबत्ती  जो रोमांस, फ्रैग्रेंस और रोशनी के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, इनसे घर के अंदर वायु प्रदूषण होता है, जो कैंडिल पेट्रोलियम से तैयार की जाती हैं, उनको मानव कार्सिनोजेंस और इनडोर पॉल्यूशन के तौर पर जाना जाता है.      दिवाली आने को है इस्लिए हमें मोमबत्ती के प्रदूषण से अपने आप को दूर रखना चाहिए. जो लोग परफैक्ट हेल्थ मेला में आएगें उन्हें पैराफिन वैक्स मोमबत्ती के प्रदूषण के बारे में बताया जाएगा। बीसवैक्स या सोय से तैयार की गई कैंडिल, भले ही वे कितनी महंगी हो उनको सुरक्षित कहा जा सकता है क्योंकि इनसे नुकसानपरक प्रदूषण नहीं होता है. किसी मौके पर पैराफिन कैंडिल और इसके उत्सर्जन से नुकसान नहीं होता है, लेकिन सालों तक पैराफिन की कैंडिल की रोशनी जो बाथरूम या टब पर इस्तेमाल की जाती है तो यह समस्या का सबब बन सकती है. वेंटिलेशन से बंद कमरों के प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सकता है. जलती हुई कैंडिल से होने वाले प्रदूषण से भी सांस संबंधी समस्या या एलर्जी हो सकती है।

“लाल टोपी फैंक दी बंदरों ने ...!!”

लाल-टोपी बेचने वाले थके व्यापारी को पेड़ की छांह भा गई थी उसने लट्टे में बंधे 4 रोट में से दो रोट सूते और ठंडे पानी से प्यास बुझाई ... एक झपकी लेने की गरज से गठरी सिरहाना बनाया और लगा ख़ुर्र-ख़ुर्र खुर्राटे भरने. तब तक बन्दरों के मुखिया टोपी पहन कर चेलों को भी टोपी पहना दी . जागते ही व्यापारी ने अपने अपने सर की टोपी फैंकी सारे बंदरों ने वही किया अपने सर की लाल-टोपियाँ ज़मीन पर फैंक दी . सदियों से नानी दादी की इस कहानी का अर्थ हर हिन्दुस्तानी के रक्त में बह रहा है. ........ रक्त जो ज़ेहन तक जाता है जेहन जो उसे साफ़ करता है जो मान्यताएं बदलता है... ज़ेहन जो संवादी है ... उसे साफ़ रखो जोड़ लो पुर्जा पुर्ज़ा जिनको ज़रुरत है जोड़ने की ...!!