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अक्तूबर, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तरक्क़ी और गधे : गिरीश बिल्लोरे मुकुल

                  हमने सड़क पर एक बैसाख नन्दन का दूसरे बैसाख नन्दनों का वार्तालाप सुना ..आपने सुना सुना भी होगा तो क्या खाक़ समझेंगे आप   आपको समझ में नहीं आई होगी क्योंकि अपने भाई बन्दों की भाषा हम ही समझ सकतें हैं ।     आप सुनना चाहतें हैं.......... ? सो बताए देता हूँ हूँ भाई लोग क्या बतिया रहे थे : पहला :-भाई , तुम्हारे मालिक ने ब्राड-बैन्ड ले लिया .. ? दूजा :- हाँ , कहता है कि इससे उसके बच्चे तरक्की करेंगें ? पहला :-कैसे , दूजा :- जैसे हम लोग   निरंतर   तरक्की कर रहे हैं पहला :-अच्छा , अपनी जैसी तरक्की दूजा :- हाँ भाई वैसी ही , उससे भी आगे पहला :-यानी कि इस बार अपने को वो पीछे कर देंगें.. ? दूजा :-अरे भाई आगे मत पूछना सब गड़बड़ हो जाएगा पहला :-सो क्या तरक्की हुई तुम्हारे मालिक की दूजा :- हाँ , हुई न अब वो मुझसे नहीं इंटरनेट के ज़रिए दूर तक के अपने भाई बन्दों से बात करता है। सुना है कि वो परसाई जी से भी महान हो ने जा रहा है आजकल विश्व को व्यंग्य क्या है हास्य कहाँ है , ब्लॉग किसे कहतें हैं बता रहा है। पहला :- कुछ समझ रहा हूँ किंतु इस में तरक्की की क्या बात हुई

श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे : डा. प्रेम जन्मेजय

                                  अभी- अभी दुखद समाचार मिला कि हमारे समय के श्रेष्ठ रचनाकार एवं मानवीय गुणों से संपन्न श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे। बहुत दिनों से अस्वस्थ थे परंतु निरंतर यह भी विश्वास था कि वे जल्दी स्वस्थ होंगे। परंतु हर विश्वास रक्षा के योग्य कहां होता है। यह मेरे लिए एक व्यक्तिगत क्षति है। उनके जाने से एक ऐसा अभाव पैदा हुआ है जिसे भरा नहीं जा सकता है। परसाई की तरह उन्होंने भी हिंदी व्यंग्य साहित्य को ,अपनी रचनात्मकता के द्वारा, जो सार्थक दिशा दी है वह बहुमूल्य है।पिछले दिनों उनसे आखिरी बात तब हुई थी जिस दिन उन्हें ज्ञानपीठ द्वारा सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई थी। 21 सितम्बर को सुबह, एक मनचाहा, सुखद एवं रोमांचित समाचार, पहले सुबह छह बजे आकाशवाणी ने समाचारों द्वारा और फिर सुबह की अखबार ने दिया- श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ज्ञानपीठ पुरस्कार। ‘नई दुनिया’ ने शीर्षक दिया, ‘उम्र के इस पड़ाव में खास रोमांचित नहीं करता पुरस्कार- श्रीलाल।’ पढ़ते ही मन ने पहली प्रतिक्रिया दी कि श्रीलाल जी पुरस्कार आपको तो खास रोमांचित नहीं करता पर मेरे जैसे, आपके अनेक पाठकों को, बहुत रोमांचित

शुभ दीपावली...

मिसफ़िट के पाठकों की संख्या 50,000 का आंकड़ा पार

किसी के लिये हो न हो मेरे लिये बड़ी बात है कि मिसफ़िट के पाठकों की संख्या 50,000 का आंकड़ा पार कर चुकी है.मेरे बेशक सभी ब्लाग के पाठकों की संख्या को जोड़ लें तो ७५ हज़ार से ज़्यादा है. पर क्या लिखने मात्र से यह सम्भव था. कदापि नहीं.. मुझे  आभासी दुनिया का एहसासी स्पर्श जो मिला बहुत उत्साहित किया सबने टांग भी खींची पर अर्रा के खुद ही गिर गये कुछेक उनकी यह दशा मुझे दुखी कर रही है.. बहरहाल सभी का आभार कि मिसफ़िट को एक महत्व-पूर्ण दर्ज़ा दिलाया                                   आभार उनका जो साथ हैं जी जो साथ थे जो सदा साथ होंगें जो साथ आ जाएंगे कल..! और मुझ जैसे अकिंचन को  जो अपने अभिव्यक्त विचारों के पुलिंदे को लेकर बेहद मायूस था  .. कि क्या करूं किस तरह लोगों तक ले जाऊं इनको उत्साहित किया. समीरलाल श्रद्धा जैन पूर्णिमा वर्मन जैसे हस्ताक्षरों का तो आजीवन ऋणी रहूंगा जिनने हिंदी ब्लागिंग के सलीके सिखाए इन त्रि-मूर्तियों को गुरु का दर्ज़ा दिये बिना मुझे चैन न मिलेगा. 2007 से शुरु ब्लागिंग का सफ़र में मुझे ललित शर्मा,यशवंत सिंह,अशोक बज़ाज,शायर अशोक,  ने बेहद प्रोत्साहित किया उधर बिंदास