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जुलाई, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अनिल अम्बानी की नज़र में "केदारनाथ हो या....!!"

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आपके इस चिन्ह को सब याद रखतें हैं चाहे सहवाग की माताजी हों या तीर्थ करने निकले बेटा बहू जिन्हें जिस सत्य यानी सच का दर्शन आपके विज्ञापनों के ज़रिए हुआ वो चारों वेदों अट्ठारह पुरानों से सम्भव नहीं था आदरणीय अनिल भाई सत्य दर्शन करानें के लिए मध्यम-वर्गीय दंपत्तियों की ओर से आपको आभार का ट्रक कहाँ भेजना है ज़रूर बताइए भैया अनिल भाई आपने सच माँ-की-ममता को अपने ब्रांड के साथ जोड़ कर कर जो विज्ञापन बनवाए बेजोड़ हैं।आप ने सहवाग की माताजी वाले विज्ञापन के बाद आज मातृभक्त पुत्रों और उनकी पत्नियों को जो शिक्षा दी सच कितनी उपयोगी साबित हो रही है आप इस बिन्दु से अनभिज्ञ हैं ...शायद ...!! बूढ़ी माताजी ने रमेश को कई बार कहा था की बेटे मुझे तीरथ वरत करा करा दे बेटा । उधर रमेश की बीवी उषा ने कहा: "क्यों जी अम्मा को कहाँ बदरी नाथ ,केदार नाथ, ले जाओ गे ।" ''फ़िर मना थोड़े करूंगा ...?" "कर सकते हो दिमाग तो लगाओ , अम्मा को समझाओ !" "सुभगे,कैसे समझाऊं....?" तभी स्टार प्लस पे आपका विज्ञापन दिखाया जिसमें बद्रीनाथ,के मन्दिर के द्वार पे लगे घंटे की आवाज़ आपके पवित्र

तुमको सोने का हार दिला दूँ

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सुनो प्रिया मैं गाँव गया था भईयाजी के साथ गया था बनके मैं सौगात गया था घर को हम दौनों ने मिलकर दो भागों मैं बाँट लिया था अपना हिस्सा छाँट लिया था पटवारी को गाँव बुलाकर सौ-सौ हथकंडे आजमाकर खेत बराबर बांटे हमने पुस्तैनी पीतल के बरतन आपस मैं ही छांटे हमने फ़िर खवास से ख़बर बताई होगी खेत घर सबकी बिकवाई अगले दिन सब बेच बांच के हम लौटे इतिहास ताप के हाथों में नोट हमारे सपन भरे से नयन तुम्हारे प्लाट कार सब आ जाएगी मुनिया भी परिणी जाएगी सिंटू की फीस की ख़ातिर अब तंगी कैसे आएगी ? अपने छोटे छोटे सपने बाबूजी की मेहनत से पूरे पतला खाके मोटा पहना माँ ने कभी न पहना गहना चलो घर में मैं खुशियाँ ला दूँ तुमको सोने का हार दिला दूँ =>गिरीश बिल्लोरे मुकुल [निवेदन:इस कविता के साथ लगी फोटो पर जिस किसी को भी आपत्ति सत्व के कारण हो तो कृपया तत्काल बताइए ताकी वैकल्पिक व्यवस्था की जावे सादर:मुकुल ]

tasweeren

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वाइस-ऑफ़-इंडिया-"द्वितीय"

इंडिया फोरम

नीरज जी के नाम खुला ख़त

नीरज जी शुक्रिया आप के आलेख भी जबरदस्त होते हैं मधुबाला की तस्वीर को परिभाषित करतीं आपकी ये पंक्तियाँ जो मधुबाला को मोनालिसा से तौलतीं हैं मुझे आपसे जोड़े रखने का मुख्य कारण है:- जो बात गीता में अन्जील और कुरान में है उसी तरह की सदाकत तेरी मुस्कान में है और ये तो कमाल है भीगती "नीरज" किसी की याद में आँख को सबसे छुपाना सीखिए यायावर जी को और विस्तार पथ प्रशस्त करने आपने जो पोस्ट लिखी वहीं से ये दोहे तुम साँसों में बस गयीं,बन बंसी अभिराम तन वृन्दावन हो गया,पागल मन घनश्याम ज्ञानी,ध्यानी,संयमी,जोगी,जती,प्रवीण फागुन के दरबार में,सब कौडी के तीन आपकी चयन प्रकृति का परिचय है फ़िर जिस लज़ीज तरीके से "बेक्ड-समोसे" परोसे उसके लिए सुबह-सुबह शुक्रिया बेहतरीन ब्लॉग के लिए बधाइयों के ट्रक मुंबई में इस पते पर भेज दूँ नीरज गोस्वामी मुम्बई, महाराष्ट्र, इंडिया किंतु पूरा पता मिलता तो उम्दा होता खैर कोई गल नहीं आपके पूरे ब्लॉग में ये बात मुझे सटीक नहीं लगती जिंदगी भाग दौड़ की "नीरज" यूँ लगे नीम पर करेला है ये मेरी सोच है बुरा मत मानिए आप जैसा मुम्बइया-भाषा:"बिंदास" व्यक

मेरा प्रिय गीत

Get this widget Track details eSnips Social DNA अमीर खुसरो कृत "छाप-तिलक सब छीनी मोसे नैना मिलिके "

लालों के लाल समीर लाल

उडन तश्तरी ....: मैं गाँधी से मिला हूँ!!

एक नज़र इधर भी

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तुम आपस में बिजली बिजली खेल रहे हो मै भी एक बार ऐसा खेल खेल चुका हूँ कितनी कोशिशों के बाद भी मामले में कोई दबाव न बना सका मुझे ऐसा करंट लगा कि खैर छोडिए अमेरिका था भारत होता तो मेरी लाई लुट जाती साभार Friends18।com Funny Animation

हिडिम्ब : क्लासिक आख्यानों की सभी खूबियों से परिपूर्ण एक दुर्लभ उपन्यास( समीक्षक श्रीनिवास श्रीकान्त)

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श्री एस.आर.हरनोट एस. आर. हरनोट का उपन्यास हिडिम्ब पर्वतांचल के एक भूखण्ड, वहां की एथनिक संस्कृति और उसकी समकालीन सामाजिक वस्तुस्थिति को रेखांकित करता एक ऐसा यथार्थपरक आख्यान है जो देहात के उत्पीडि़त आदमी की जैवी कथा और उसके समग्र परिवेश का एक सही लोखाचित्र के फ्रेम में प्रस्तुत करता है। भाषा और भाव के स्तर पर उलटफेर से गुरेज़ करता हुआ, किन्तु पहाड़ी देहात के ज्वलंत जातीय प्रश्नों को उनकी पूरी पूरी तफ़सीलों के साथ उकेरता हुआ। कहानी यों चलती है जैसे कोई सिनेमेटोग्राफ हो। लेखक खुद भी एक क्रिएटिव छायाकार है इसलिए सम्भवत: उसने हिडिम्ब की कहानी को एक छाया चित्रकार की तरह ही प्रस्तुत किया है। अपने गद्य को सजीव लैण्डस्केपों में बदलता हुआ। इस प्रकार के कथा शिल्प में पहली बार यह महसूस हुआ कि यथार्थ के मूल तत्व को उसमे किस तरह महफूज रखा जा सकता है। ऐसा गल्पित और कल्पित यथार्थ एक साथ अर्थमय भी है और अपने परिप्रेक्ष्य में भव्य भी। उपन्यासकार ने सबसे पहले अपने पाठक को मूल कथा-चरित्रों का परिचय दिया है। इस तरह के परिचय अक्सर पुराने क्लासिक उपन्यासों में देखे जा सकते हैं। हिडिम्ब में ऐसी पूर्व

कार्टूनिष्ट राजेश कुमार दुबे

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doobeyji वाले राजेश कुमार दुबे बेहद संजीदा इंसान हैं । इनके इर्द गिर्द जो भी दिखाई देता है बड़े सलीके से दिमाग की जेब में डाल लेतें हैं । जबलपुर में कार्टूनिष्टों की लम्बी क़तार तो नहीं है किंतु जितने भी हैं उनमें भाई राजेश का जबाव नहीं इन दिनों वे इन दो ब्लॉग पर काम कर रहे हैं रंग परसाई दुबेजी दोनों ही ब्लॉग कार्टूनों से सजाते दुबे जी को शुभ कामनाएं