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शनिवार, अप्रैल 7

कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए


जब भी तन्हां हुए तुझसे रूबरू हुए
बरसों हुए - बज़्म  हुए ,गुफ़्तगूं  हुए !!
आए हैं जबसे सामने  धुआंधार  हम तेरे-
थमते गए तूफ़ां वो बेआबरू हुए !!
कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे
कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए.
बेवज़ह चापलूसी का ईनाम मिला यार-
कुछ इस तरह एक से चार हम हुए.
बच्चों को पालना है वर्ना खोलता छतैं-
कोई बताए आके हम ऐसे क्यूं हुए .

बुधवार, जनवरी 18

क़रीब दिल के क़िताब रखना !

टेक्स्ट

                  क़रीब दिल के क़िताब रखना !
                  छिपा के उसमें गुलाब रखना !
                   नज़र में पहली ये प्यार कैसा -
                   नज़र-नज़र का हिसाब रखना !
                   लबों से बिखरे हंसी अचानक -
                   तो लब पे हाज़िर ज़वाब रखना !
                   हां कह दो जाके सितमग़रों से
                   है रब को आता हिसाब रखना !
                   हां इक कमीं है मुकुल में यारो-
                   नहीं सुहाता हिसाब रखना !!
                           * गिरीश बिल्लोरे "मुकुल”