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बुधवार, अप्रैल 18

कभी देखिये तो आईने में ज़रा किसी भेड़िये से कम नज़र नहीं आते हम



साभार: आलोक मलिक के ब्लाग -"कलम से"
साभार:"पद्मावलि"
                      सगाई हुई.. दो दिन बाद किसी वज़ह से रिश्ता टूट गया. लड़के वाले परिवार में कोई फ़र्क नहीं पड़ा .लड़की वाला परिवार कुछ दिन  उदास रहा.नियति मान कर मां-बाप ने बात को  आई गई कर दिया.  किसे मालूम कि बिटिया के दिल पे क्या बीती ? पता करने की भी क्या ज़रूरत क्यों बेवज़ह किसी को कुदेरा जाए. लड़की का हृदय किसने बांचा जो पल पल गुलती है कभी अपने भाग्य को तो कभी अपने सांवले,मोटे,बेढप होने के दर्द को बारी बारी गिन रही होती है. लानत भेजिये ऐसी  सामाजिक व्यवस्था को उसके व्यवस्थापकों को जो  हर कमज़ोर को शिकार बनाती है. लड़की ने सल्फ़ास खा कर आत्म हत्या की कोशिश की उफ़्फ़ !! क्या यही उसकी कायरता थी जो वो अपराध बोध से ग्रसित आत्महंता हुई..हां थी उसकी कायरता कि वो हार गई पर गौर से देखिये हम और आप उससे बड़े कायर हैं जो समाज के ऐसे लोगों को समझाने ज़ुबां खोलने की हिम्मत न कर सके जो सगाई तोड़ देने की जुर्रत करते चले आ रहे हैं. अथवा लड़कियों को दहेज-का रास्ता मात्र है मानते हैं.  नहीं करते हम कायर जन  इस व्यवस्था के खिलाफ़ कोई हल्ला .. कोई हंगामा .... क्यों हम सबसे मासूम हृदयों के प्रति निष्टुर हैं..?  वास्तव में हम अपने आप को एक आवरण से ढंक कर रख लेते हैं शायद यह सोचकर कि हमारे पल्ले भी बेटियां हैं .. समाज क्या कहेगा..? शायद हमारा आचरण हमारे कल के लिये घातक हो यानी आपने किसी गलत विचारधारा को रोकने की कोशिश की तो शायद हमारे व्यक्तित्व पर स्थाई धब्बा लग जाएगा. क्यों हो जाते हैं हम ऐसी व्यवस्था के सामने बेज़ुबान क्या इसे कायरता नहीं कहेंगे..?
           जब हम दहेज मांगते हैं तो सोचतें हैं कि -"ये तो हमारा हक़ है...!" कभी देखिये तो आईने में ज़रा किसी भेड़िये से कम नज़र नहीं आते हम जब दहेज़ की वज़ह से लड़की को लांछित कर तोड़ देते हैं सगाई.