मंगलवार, दिसंबर 20

भ्रमर दंश सहे कितने, उसको कैसे कहो, कहूंगा ?

आभार :- नितिन कुमार पामिस्ट 

  एक अकेला कँवल ताल में,  संबंधों की रास खोजता !
     रोज़ त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!

बहता दरिया  चुहलबाज़ है,
 तिनका तिनका छीन कँवल से ,
दौड़ लगा देता है अक्सर
,   पागल सा फिर त्राण  मसल के ! 
है सबका सरोज प्रिय किन्तु  
,
 उसे दर्द क्या.? कौन सोचता !!
     एक अकेला कँवल ताल में,  संबंधों की रास खोजता !

रात कुमुदनी जागेगी तब,  मैं विश्रामागार रहूँगा
भ्रमर दंश सहे कितने, उसको कैसे कहो, कहूंगा ?
कैसे पीढा व्यक्त करूंगा अभिव्यक्ति की राह खोजता !!
              जाग भोर की प्रथम किरन से, अंतिम तक मैं संत्रास भोगता !

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