शनिवार, दिसंबर 31

आभार 2011 ... !!

जा रहे हो बीते बरस तुम्हारा आभार तो कर दूं ..!

 तुम्हारे साथ बीते पलों ने नये के स्वागत का सलीका सिखा ही दिया.. .

 तुम भले सवालों को सुलगा सुलगा जवाबों को कसौटी पे परखते रहे .. अरे हां वो तुम ही थे न जो कभी तेज़ी से तो कभी हौले-हौले अपनी पाथ पर सरकते रहे .. हां बीते बरस तुम ने ही तो बताया क्रांति और अवसरवादिता में फ़र्क सच कितना कड़्वा होता है बूढ़ी देह को जाते-जाते तुमने कर ही दिया सतर्क. सच इस बार तुम्हारा साथ बहुत कुछ दिखा गया .. हां सूरज को रौशनी की ज़रूरत थी.. तुम्हारा ही हाथ था न जो उसे दीपक दिखा गया. सच तुम्हारे तिलिस्म को भूल न पाऊंगा तुम्हारे गीत दिन दोपहरी जब भी तुम्हारी याद आएगी गुन गुनाऊंगा. 
  इस बरस तुमने मुझे जी भर के हंसाया हां उसी हंसी के पीछे था मैने अपने दर्द का पोटला छिपाया.. ओ बीते तिलिस्मी बरस तुम जा रहे हो न.. बताओ  फ़िर कभी आओगे न उदास चेहरों पे मुस्कान सजाओगे न.. आना ज़रूर आना.. प्राकृतिक-न्याय क्या होता है सबको बताना.. तुम्हारा ये काम अभी अधूरा है.. अब विदा देता हूं
नेये को स्वागत का कार्ड दिखाना है 

गुरुवार, दिसंबर 29

तुम मेरे साथ एक दो क़दम ........


तुम मेरे साथ
एक दो क़दम चलने का
अभिनय मत करो
एक ही बिंदू पर खड़े-खड़े
दूरियां तय मत करो..!
तुमको जानता हूं
फ़ायदा उठाओगे -
मेरे दुखड़े गाने का
मुझे मालूम है
तुम मेरे आंसू पौंछने को भी
भुनाते हो
तुम सदन में मेरे
दर्द की दास्तां सुनाते हो !
तुम जो
हमारी भूख को भी भुनाते हो !
तुम जो कर रहे हो
उसे “अकिंचन-सेवा” का नाम न दो..!!
जो भी तुम करते हो
उसे दीवारों पर मत लिखो ..!!
तुम जो करते हो उसमें
तुम्हारा बहुत कुछ सन्निहित है
मित्र
ये सिर्फ़ तुम जानते हो..?
      न ये तो सर्व विदित है…!

बुधवार, दिसंबर 28

मां ने कहा तो था .... शत्रुता का भाव जीवन को बोझिल कर देता है : मां यादों के झरोखे से

मां बीस बरस पहले 
मां निधन के एक बरस पहले 

यूं तो तीसरी हिंदी दर्ज़े तक पढ़ी थीं मेरी मां जिनको हम सब सव्यसाची कहते हैं क्यों कहा हमने उनको सव्यसाची क्या वे अर्जुन थीं.. कृष्ण ने उसे ही तो सव्यसाची कहा था..? न तो क्या वे धनुर्धारी थीं जो कि दाएं हाथ से भी धनुष चला सकतीं थीं..? न मां ये तो न थीं हमारी मां थीं सबसे अच्छी थीं मां हमारी..! जी जैसी सबकी मां सबसे अच्छी होतीं हैं कभी दूर देश से अपनी मां को याद किया तो गांव में बसी मां आपको सबसे अच्छी लगती है न हां ठीक उतनी ही सबसे अच्छी मां थीं .. हां सवाल जहां के तहां है हमने उनको सव्यसाची   क्यों कहा..!
तो याद कीजिये कृष्ण ने उस पवित्र अर्जुन को "सव्यसाची" तब कहा था जब उसने कहा -"प्रभू, इनमें मेरा शत्रु कोई नहीं कोई चाचा है.. कोई मामा है, कोई बाल सखा है सब किसी न किसी नाते से मेरे नातेदार हैं.."
यानी अर्जुन में तब अदभुत अपनत्व भाव हिलोरें ले रहा था..तब कृष्ण ने अर्जुन को सव्यसाची सम्बोधित कर गीता का उपदेश दिया.अर्जुन से मां  की तुलना नहीं करना चाहता कोई भी "मां" के आगे भगवान को भी महान नहीं मानता मैं भी नहीं "मां" तो मातृत्व का वो आध्यात्मिक भाव है जिसका प्राकट्य विश्व के किसी भी अवतार को ज्ञानियों के मानस में न हुआ था न ही हो सकता वो तो केवल "मां" ही महसूस करतीं हैं. 
          जी ये भाव मैने कई बार देखा मां के विचारों में "शत्रु विहीनता का भाव " एक बार एक क़रीबी नातेदार के द्वारा हम सबों को अपनी आदत के वशीभूत होकर अपमानित किया खूब नीचा दिखाया .. हम ने कहा -"मां,इस व्यक्ति के घर नजाएंगे कभी कुछ भी हो इससे नाता तोड़ लो " तब मां ने ही तो कहा था मां ने कहा तो था .... शत्रुता का भाव जीवन को बोझिल कर देता है ध्यान से देखो तुम तो कवि हो न शत्रुता में निर्माण की क्षमता कहां होती है. यह कह कर  मां मुस्कुरा दी थी तब जैसे प्रतिहिंसा क्या है उनको कोई ज्ञान न हो .मेरे विवाह के आमंत्रण को घर के देवाले को सौंपने के बाद सबसे पहले पिता जी को लेकर उसी निकटस्थ परिजन के घर गईं जिसने बहुधा हमारा अपमान किया करता और उस नातेदार मां के चरणों को पश्चाताप के अश्रुओं से पखारा. वो मां ही तो थीं जिसने  उस एक परिवार को सबसे पहले सामाजिक-सम्मान दिया जिन्हैं दहेज के आरोप  कारण जेल जाना पड़ा आज़ भी वे सव्यसाची के "सम्पृक्त भाव" की चर्चा करते नहीं अघाते .
                    जननी ने बहुत अभावों में आध्यात्मिक-भाव और सदाचार के पाठ हमको पढ़ाने में कोताही न बरती.
   हां मां तीसरी हिंदी पास थी संस्कृत हिन्दी की ज्ञात गुरु कृपा से हुईं अंग्रेजी भी तो जानती थी मां उसने दुनिया   खूब बांची थी. पर दुनिया से कोई दुराव न कभी मैने देखा नहीं मुझे अच्छी तरह याद है वो मेरे शायर मित्र  इरफ़ान झांस्वी से क़ुरान और इस्लाम पर खूब चर्चा करतीं थीं . उनकी मित्र प्रोफ़ेसर परवीन हक़  हो या कोई अनपढ़ जाहिल गंवार मजदूरिन मां सबको आदर देती थी ऐसा कई बार देखा कि मां ने धन-जाति-धर्म-वर्ग-ज्ञान-योग्यता आधारित वर्गीकरण को सिरे से नक़ारा  आज मां  यादों के झरोखे से झांखती यही सब तो कहती है हमसे ,... सच मां जो भगवान से भी बढ़कर होती है उसे देखो ध्यान से विश्व की हर मां को मेरा विनत प्रणाम 
आज मां की सातवीं बरसी थी हम बस याद करते रहे उनको और कोशिश करते रहे  उनके आध्यात्मिक भाव को समझने की.. 
आज़ बाल-निकेतन और नेत्रहीन कन्या विद्यालय में जाकर बच्चों से मिलकर फ़िर से मन पावन भावों को जगा गया सच शत्रुता निबाहने से ज़्यादा ज़रूरी काम हैं न हमारे पास चलें देखें किसी ऐसे समूह को जो अभावों के साथ जीवन जी रहा है 

मां.....!!
छाँह नीम की तेरा आँचल,
वाणी तेरी वेद ऋचाएँ।
सव्यसाची कैसे हम तुम बिन,
जीवन पथ को सहज बनाएँ।।


कोख में अपनी हमें बसाके,
तापस-सा सम्मान दिया।।
पीड़ा सह के जनम दिया- माँ,
साँसों का वरदान दिया।।
प्रसव-वेदना सहने वाली, कैसे तेरा कर्ज़ चुकाएँ।।

ममतामयी, त्याग की प्रतिमा-
ओ निर्माणी जीवन की।
तुम बिन किससे कहूँ व्यथा मैं-
अपने इस बेसुध मन की।।
माँ बिन कोई नहीं,
सक्षम है करुणा रस का ज्ञान कराएँ।
तीली-तीली जोड़ के तुमने
अक्षर जो सिखलाएँ थे।।
वो अक्षर भाषा में बदलें-
भाव ज्ञान बन छाए वे !!
तुम बिन माँ भावों ने सूनेपन के अर्थ बताए !!

                                       "इस वर्ष मां की स्मृति में आशीष शुक्ला को सव्यसाची अलंकरण दिया"

मंगलवार, दिसंबर 27

रवींद्र बाजपेई सकारात्मक पत्रकारिता के संवाहक : श्री अनिल शर्मा


मंचासीन अतिथिगण
जबलपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष
श्री अनिल शर्मा सरस्वती पूजन करते हुए
 विद्युत मंडल के पी आर ओ श्रीराकेश पाठक 
वरिष्ठ पत्रकार श्री रवींद्र बाजपेई 
जबलपुर 24 दिसम्बर 2011 को स्थानीय फ़न-पार्क में जबलपुर का प्रतिष्ठापूर्ण समारोह   स्वर्गीय हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह 2011 सम्पन्न हुआ. मुख्य अथिति के रूप में बोलते हुए सम्मान का आधार ही त्याग और तपस्या है. आज़ जिनकी स्मृति में सम्मान दिया जा रहा है वे पत्रकारिता एवम सम्पूर्ण मानव जाति की सेवा के लिये कृत संकल्पित थे मैं ऐसे व्यक्तित्वो को नमन करते हुए  मित्र रवींद्र बाजपेई को शुभकामनाएं देता हूं कि वे मूर्धन्य पत्रकार हीरालाल गुप्त स्मृति प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित हुए हैं. युवा पत्र-संचालक भाई आशीष शुक्ल को मेरी अशेष शुभकामनाएं हैं जिन्हैं त्याग की मूर्ति सव्यसाची मां प्रमिला देवी की स्मृति में सम्मानित किया . 

अध्यक्षीय आसंदी से बोलते हुए समाज सेवी एवम जबलपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री अनिल शर्मा ने कहा:- "रवींद्र बाजपेई सकारात्मक पत्रकारिता के संवाहक हैं उनका सम्मान करना बेशक नकारात्मकता को हतोत्साहित कर सृजनशीलता को समादरित करना है. साथ ही श्री आशीष शुक्ला को सव्यसाची मां प्रमिला देवी की स्मृति सम्मान से समादरित कर आयोजकों ने पत्रकारिता में युवा चेतना को प्रोत्साहित करने का मार्ग तय कर दिया है."
        विशिष्ठ अतिथि समाज सेवी श्री शेखर अग्रवाल संचालक डिजी टेलिविजन ने पंद्रह साल से जारी आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि मीडिया समाज को खबर देकर अपना दायित्व पूरा नहीं मान लेना चाहिये मीडिया समाज में सकारात्मकता के प्रसार का मूलाधार है. जिसे रवींद्र जी जैसे राष्ट्रीय स्तर के कलम कार विभिन्न विषयों के ज्ञाता और आशीष भाई जैसे कुशल प्रबंधक गति दे रहे हैं. 
       ड्रीमलैण्ड फ़नपार्क जबलपुर  में आयोजित कार्यक्रम का शुभारम्भ  सरस्वती प्रतिमा पूजन से हुआ  तदुपरांत अतिथियों एवम विभिन्न संस्थाओं से पधारे प्रतिनिधियों ने स्व०श्रीयुत हीरालाल गुप्त एवम मां सव्य-साची प्रमिला देवी बिल्लोरे के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की.
                  अतिथियों के स्वागत उपरांत विचार अभिव्यक्ति के क्रम में जादूगर एस के निगम ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप एवम गुप्त जी एवम उनकी समकालीन पत्रकारिता विषय पर विचार व्यक्त किये जबकि युवा ब्लागर एवम कवि गीतकार डा० विजय तिवारी किसलय ने 1997 से  प्रतिष्ठापूर्ण समारोह  के बारे में विस्तार से जानकारी दी.डा० किसलय का मत था कि  हम इस कार्यक्रम के ज़रिये संस्कारित सामाजिक चेतना में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करणे की कोशिश करतें हैं जिसकी ज्योति  स्व० गुप्त जी जैसे कलमकारों ने अभावों से जूझते हुई जगाई थी. 
    

रविवार, दिसंबर 25

ओबामा के पुनर्निर्वाचन का तुरुप का पत्ता तेहरान के पास है :डैनियल पाइप्स ( हिन्दी अनुवाद - अमिताभ त्रिपाठी)


15 दिसम्बर को इराक में औपचारिक रूप से युद्ध की समाप्ति के पश्चात पडोसी ईरान 2012 के अमेरिकी राष्ट्रपतीय चुनाव में एक प्रमुख अनिश्चित तत्व हो गया है।
पहले सिंहावलोकन कर लें: 1980 में ईरान के मुल्लाओं को अमेरिकी राजनीति प्रभावित करने का अवसर पहले ही प्राप्त हो चुका है। तेहरान में अमेरिकी दूतावास को 444 दिनों तक बंधक बनाने से राष्ट्रपति जिमी कार्टर के पुनर्निर्वाचन के अभियान को गहरा धक्का लगा था इसके साथ ही कुछ अन्य घटनाक्रम के चलते जैसे बंधकों को छुडाने का असफल प्रयास और एबीसी चैनल द्वारा America Held Hostage कार्यक्रम के प्रसारण ने उनकी पराजय में योगदान किया। अयातोला खोमेनी ने कार्टर की सम्भावनाओं को धता दिया कि आश्चर्य ढंग से बंधकों को अक्टूबर में मुक्त करा लिया जाये और रही सही कसर तब पूरी कर दी जब रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय ही इन बंधंकों को मुक्त कर दिया।
आज एक बार फिर ओबामा के पुनर्निर्वाचन में ईरान की दो प्रमुख भूमिका है एक तो इराक में बाधक की भूमिका या फिर अमेरिका के आक्रमण का शिकार बनना। आइये दोनों पर ही विचार करते हैं।
किसने इराक गँवाया? हालाँकि जार्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने इराकी सरकार के साथ इस बात का समझौता किया था कि , " 31 दिसम्बर 2011 तक अमेरिका की सारी सेना इराकी राज्यक्षेत्र से बाहर चली जायेगी" ओबामा द्वारा यह निर्णय लेने से कि कोई भी पूरक सेना भी इराक में शेष नहीं रहेगी पूरी तरह से उनका निर्णय और उनका बोझ था। इससे उन पर जोखिम बढ गया है यदि 2012 तक इराक में स्थितियाँ बुरी होती हैं तो इसके लिये निंदा का पात्र बुश को नहीं उनको बनना होगा। दूसरे शब्दों में ईरान के शीर्ष मार्गदर्शक अली खोमेनी ओबामा का जीना दुश्वार कर सकते हैं।
खोमेनी के पास अनेक विकल्प हैं: वे उन अनेक इराकी नेताओं के ऊपर अपना दबाव बढा सकते हैं जो कि शिया इस्लामवादी हैं और ईरान समर्थक भाव रखते हैं और उनमें से कुछ तो ईरान में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उदाहरण के लिये प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी इस श्रेणी में पूरी तरह योग्य हैं। ईरान अपने देश की खुफिया सेवा के माध्यम से भी इराक की राजनीति को प्रभावित कर सकता है जिसमें कि उनका प्रवेश काफी हद तक हो भी चुका है। या फिर अब हजारों हजार की अमेरिकी सेना के इराक के उत्तरी सीमा से चले जाने के बाद वे अपनी मनमर्जी से इराक में सेना भेज कर किसी भी शरारतपूर्ण कृत्य में लिप्त हो सकते हैं। अंत में वे मुक्तदा अल सद्र जैसे अपने छ्द्म संगठनों को सहयोग कर सकते हैं या फिर आतंकवादी एजेंट को भेज सकते हैं।
1980 में ईरानियों ने बंधक बनाकर अमेरिका की राजनीतिक प्रकिया में हस्तक्षेप किया था अब 2012 में इराक उनके लिये अवसर प्रदान करता है। यदि ईरान के शासक 6 नवम्बर से पहले समस्या उत्पन्न करते हैं तो रिपब्लिकन प्रत्याशी " इराक को गँवाने" के लिये ओबामा को दोष देंगे। ओबामा द्वारा लम्बे समय से युद्ध का विरोध करना उनके लिये भारी पडेगा।( इसके विकल्प के तौर पर ईरानी अपना रुख बदल कर अपनी धमकी को चरितार्थ कर हारमुज के जलडमरूमध्य को रोक सकते हैं जिस जलमार्ग से विश्व का 17 प्रतिशत तेल जाता है और इस प्रकार वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं).मुल्लाओं ने 1980 में कमजोर होते डेमोक्रेट को क्षतिग्रस्त किया था और वे इस बार भी ऐसा कर सकते हैं या फिर उन्हें यह लगे कि ओबामा उनकी रुचि के हैं और ऐसे किसी प्रयास से स्वयं को बचा लें। मुख्य बिंदु यह है कि सेना की वापसी ने उन्हें अतिरिक्त विकल्प दे दिया है। ओबामा को चुनावों के बाद तक सेना को रोकना चाहिये था ताकि बाद में वे आत्मविश्वास पूर्वक कह पाते कि " मैंने वह सब किया जो कर सकता था" । 
               ईरानी परमाणु पर बम गिराओ? प्रायः दो वर्ष पूर्व जबकि ओबामा के पास अमेरिकावासियों के मध्य लोकप्रियता +3 प्रतिशत थी तब भी मैंने सुझाव दिया था कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर अमेरिकी आक्रमण से ओबामा के कार्यकाल के निष्प्रभावी पहले वर्ष की यादें स्मृतिपटल से हट जायेंगी और घरेलू राजनीति का परिदृश्य बदल जायेगा जो कि उनके हित में रहेगा। एक ही कार्य के द्वारा वे अमेरिका को एक खतरनाक शत्रु से मुक्ति दिला सकते है और चुनावी प्रतिस्पर्धा को नया स्वरूप दे सकते हैं। " इससे स्वास्थ्य कल्याण का मुद्दा अलग चला जायेगा और रिपब्लिकन भी डेमोक्रेट के साथ कार्य करने को विवश होंगे, इससे सोशल मीडिया वाले राजनीतिक कार्यकर्ता भौचक रह जायेंगे, निर्दलीय पुनर्विचार को बाध्य होंगे और कंजर्वेटिव खुशी से पागल हो जायेंगे"। अब जबकि ओबामा कि लोकप्रियता ‌‌‌‌-4.4 प्रतिशत तक गिर गयी है और चुनावों में एक वर्ष से भी कम समय बचा है तो ईरान पर बम गिराने के उनके उपाय की महत्ता अधिक बढ गयी है और यह ऐसा बिंदु है जिसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से अमेरिका के अनेक वर्ग के लोगों ने की है ( सराह पालिन, पैट बुचानन, डिक चेनी, रोन पाल, इलिओट अब्राम्स, जार्ज फ्रीडमैन, डेविड ब्रोडर, डोनाल्ड ट्र्म्प)। स्वास्थ्य कल्याण, रोजगार और ऋण का प्रस्ताव राष्ट्रपति के लिये अधिक सम्भावना लेकर नहीं आते , वामपंथ पूरी तरह निराश है और स्वतन्त्र मतों को अपनी ओर किया जा सकता है। वर्तमान स्थिति में प्रतिबंध और ड्रोन को लेकर चल रही मुठभेड केवल ध्यान बँटाने का कार्य है ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर 2012 के प्रथम चरण में आक्रमण की सम्भावना दिखती है और यह समय अमेरिका में चुनावों के निकट है यह तो स्वतः स्पष्ट है। निष्कर्ष यह है कि खोमेनी और ओबामा दोनों एक दूसरे के लिये समस्यायें खडी कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो ईरान और इराक राष्ट्रपति चुनाव में आवश्यकता से अधिक बडी भूमिका निभायेंगे और तीस वर्षों से अमेरिकी राजनीति के लिये एक समस्याग्रस्त शिशु की इनकी भूमिका जारी रहेगी।

शनिवार, दिसंबर 24

हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह् आज :पण्डित रवींद्र बाजपेई एवं आशीष शुक्ला सम्मानित होंगे

स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त मधुकर  
  हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह्  में आज हिंदी एक्सप्रेस जबलपुर के पण्डित रवींद्र बाजपेई को स्व० हीरालाल गुप्त स्मृति अलंकरण  एवं आशीष शुक्ला  यश भारत को सव्यसाची प्रमिला देवी स्मृति अलंकरण से विभूषित किया जा रहा है. वर्ष 1997 से जारी हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह् प्रति वर्ष 24 दिसंबर को जबलपुर में आयोजित होता है.                                                            
                                               मधुकर अलंकरण श्री ललित बक्षी जी 1998,बाबूलाल बडकुल 1999,निर्मल नारद 2000,श्याम कटारे 2001,डाक्टर राज कुमार तिवारी "सुमित्र"2002,पं ० भगवती धर बाजपेयी 2003,मोहन "शशि" 2004

"पं०हरिकृष्ण त्रिपाठी एवं 2005,प्रो० हनुमान वर्मा को (संयुक्त रूप से सम्मानित)अजित वर्मा 2006,पं०दिनेश् पाठक 2007,सुशील तिवारी 2008,श्री गोकुल शर्मा दैनिक भास्कर जबलपुर 2009,श्री महेश मेहेदेल स्वतंत्र-मत,जबलपुर,  एवं श्री कृष्ण कुमार शुक्ल   2010
सव्यसाची  प्रमिला देवी बिल्लोरे    
 
                 हमारी इस पहल को माँ प्रमिला देवी बिल्लोरे ने नयी पीड़ी के लिए भी प्रोत्साहन के लिए परिवार से सम्मान देने की पेशकश की और पिता जी श्री काशी नाथ बिल्लोरे ने युवा-पत्रकार को सम्मानित करने की सामग्री मय धनराशी के दे दी वर्ष 2000 से
01.श्री मदन गर्ग 2000
02." हरीश चौबे 2001
03." सुरेन्द्र दुबे 2002
04." धीरज शाह 2003
05." राजेश शर्मा 2004,
माँ प्रमिला देवी के अवसान 28/12/2004 के बाद मेरे मित्रों ने इस सम्मान का कद बढाते हुए "सव्यसाची प्रमिला देवी अलंकरण " का रूप देते हुए निम्नानुसार प्रदत्त किये
"सव्यसाची प्रमिला देवी अलंकरण "
1.श्री गंगा चरण मिश्र भास्कर.टी.वी. 2005
2." गिरीश पांडे दैनिक-भास्कर 2006
3." विजय तिवारी नई-दुनिया 2007
4.“श्री पंकज शाह राज केबल 2008
5.* ” श्री सनत जैन भोपाल 2009*हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लागर  श्री महेंद्र मिश्रा 

6. श्री ओम कोहली, डिजी-केबल  जबलपुर एवं हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लागर : समीरलाल,कनाडा, श्री लिमटी खरे नई दिल्ली   2010,

मंगलवार, दिसंबर 20

मेरी कविता - मेरी आवाज

पिछले दिनों बेटे ने ये करवाया मुझसे .....कहता है कभी खुद का भी पढ़ो....तो ये पॉडकस्ट उसी का नतीजा है...अब सुनिये.....
मेरी कविता -- मेरी आवाज में

रविवार, दिसंबर 18

ब्लाग क्यों बांचें भई ?

साभार: रायटोक्रेट कुमारेंद्र जी के ब्लाग से 
हिंदी ब्लागिंग अब व्यक्तिगत-डायरी की संज्ञा से मुक्ति की पक्षधर नज़र्  आ रही है. इस विषय की पुष्टि इन दिनों आ रही पोस्ट से सहज ही हो जाती है . कुछ ब्लाग्स पर गौर करें तो बेशक वे सामयिक परिस्थितियों पर त्वरित अभिव्यक्ति की तरह सामने आ रहे हैं. इतना ही नहीं कुछ ब्लाग्स अपनी विषय परकता के कारण पढ़े जा रहे हैं.   यानी  एक ग़लत फ़हमी थी बरसों तक कि ब्लाग केवल व्यक्तिगत मामला है किंतु हिन्दी ब्लागिंग में माइक्रो ब्लागिंग साइट ट्विटर को छोड़ दिया जाए तो अब ऐसी स्थिति नहीं अब तो ट्विटर पर भी विषय विस्तार लेते नज़र आ रहे हैं. हिंदी ब्लागिंग का सकारात्मक पहलू ये है कि अब लोग स्वयम से आगे निकल कर बेबाक़ी से अपनी बात सामाजिक राजनैतिक वैश्विक मामलों पर रखने लगे हैं. ज़ी-न्यूज़ दिल्ली के सीनियर प्रोड्यूसर खुशदीप सहगल के ब्लाग देशनामा www.deshnama.com  पर समसामयिक मसलों पर  आलेखों की भरमार है तो दिल्ली के मशहूर व्यवसायी राजीव तनेजा आम जीवन से जुड़ी घटनाऒं एवम परिस्थियों से उपजे हास्य को पेश करते नज़र आते हैं अपने ब्लाग “हंसते-रहो” ( http://www.hansteraho.com), भाषा,शिक्षा और रोज़गार(http://blog.eduployment.in) ब्लाग पर आपको शिक्षा और रोज़गार से सम्बंधित ताज़ा तरीन सूचनाएं मिल जाएंगी. उधर एक अनाम ब्लागर भारतीय नागरिक ब्लाग(http://indzen.blogspot.com) पर सामयिक परिस्थितियों पर तल्ख त्वरित टिप्पणी सरीखे आलेख मिल ही जाएंगें.  पश्चिम बंगाल कलकत्ता के  अमिताभ मीत जी एक संगीत भरा किससे कहें (http://kisseykahen.blogspot.com) ब्लाग चलाते हैं. जिसमें हिन्दुस्तानी फ़िल्म एवम फ़िल्मों से हटकर संगीत से सम्बंधित सूचनाएं अटी पड़ीं हैं.    रविरतलामी जी हिंदी ब्लागिंग में नवीन तम तक़नीकों के अनुप्रयोग के लिये साधन एवम जानकारी “छींटे और बौछारें” (http://raviratlami.blogspot.com) पर देते हैं . ये केवल उदाहरण है कमोबेश सभी ब्लाग्स जो विषयाधारित आलेखन कर रहे हैं उन पर पाठकों की निर्बाध आवाजाही आज़ भी जारी है जब कि एग्रीगेटर्स का टोटा है यदि एग्रीगेटर है भी तो वे ब्लागवाणी अथवा चिट्ठाजगत का स्थान नही ले पाए. फ़िर भी संगीता पुरी जैसी ब्लागर लाख पाठक जुटाने में कामयाब हुईं हैं. तो हम भी पचास हजारी हो ही चुके हैं.  अमीर धरती गरीब लोग, स्वास्थ्य-सबके लिए, आरंभ Aarambha, गिरीश पंकज, अभिनव अनुग्रह, तीसरा खंबा, ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र, भारतीय नागरिक-Indian Citizen, अविनाश ,अर्पित सुमन :तेरा साथ वाचस्पति, आर्यावर्त, उच्चारण, जैसे ब्लाग नियमित रूप से बांचे जा रहे हैं...इनकी पठनीयता का कारण इनमें पठनीय-तत्व का होना है. ये ही नहीं और भी कई ऐसे ब्लागस हैं जिन तक पाठकों का पहुंचना तय है.

शनिवार, दिसंबर 17

अन्ना गए नेपथ्य में आज तो दिन भर वीना मलिक को तलाशते रहे लोग !!

खबरों ने इन्सान की सोच का अपहरण कर लिया वीना मलिक का खो जाना  सबसे हाट खबर  खबरिया चैनल्स के ज़रिये समाचार मिलते ही बेहद परेशान लोग "आसन्न-स्वयम्बर" के लिये चिंतित हो गये. एक खबर जीवी प्राणी कटिंग सैलून पे बोलता सुना गया:-"बताओ, कहां चली गई वीना ?"
भाई इतना टेंस था जैसे वीना मलिक के  क़रीबी रिश्तेदार  हों. जो भी हो एक बात निकल कर सामने आई ही गई कि "मीडिया जो चाहता है वही सोचतें हैं लोग...!"
   आप इस बात से सहमत हों या न हों मेरा सरोकार था इस बात को सामने लाना कि हमारे आम जीवन की ज़रूरी बातौं से अधिक अगर हम जो कुछ भी सोच रहें हैं वो तय करता है मीडिया..? ये मेरी व्यक्तिगत राय है. रहा बीना मलिक की गुमशुदगी का सवाल वो एक आम घटना है जो किसी भी मिडिल-क्लास शहर, कस्बे, गांव में घट जाती है वीना मलिक जैसी कितनी महिलाएं ऐसी अज्ञात गुमशुदगी का शिक़ार गाहे बगाहे हो ही जाती हैं. आप को याद भी न होगा अक्टूबर माह में अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी कामेंग जिले के सेपा में कामेंग नदी पर बने पुल के ढह जाने के बाद  25 लोग लापता हो गए थे.  मेरे हिसाब से हम असामान्य घटनाओं के लिये  उतने सम्वेदन-शील हैं ही नहीं जितना कि वीना मलिक को लेकर हैं. यानी हम वही सोच रहे हैं जितना अखबार अथवा खबरिया चैनल्स सोचने को कहते हैं. 
         हाल ही अन्ना जी,सिब्बल जी, चिदम्बरम जी, को लेकर प्रकाशित एवम प्रसारित हो रहीं खबरों में  लोग खोये ज़रूर किंतु शायद ही किसी ने खबरों को एक स्वस्थ्य-नज़रिये से देखा समझा हो. (यहां हम उन आम लोगों की बात कर रहे हैं जिनका ओहदा केवल; एक आम आदमी का है जो क्रिटिक/जानकार/विषेशज्ञ नहीं हैं) लोग अपमे अपने सतही तर्क के साथ व्यवस्था के विद्रोही हो जाते हैं बेशक व्यवस्था में कमियां हैं पर क्या केवल वही सही है जो दिखाया पढ़ाया जा रहा है..? क़दापि नहीं एक मित्र की राय थी कि-”बेशक़,लोकपाल पास कर दिया जा सकता है..? सी बी आई को शामिल किया जावे इसमें !"
 दूसरा मित्र बोला -"जांच कर्ता एजेन्सी के रूप में एक नई एजेन्सी बना दी जानी चाहिये..?"
पहला मित्र:-"सी.बी.आई. क्यों नहीं ? "
   आम आदमी के पास केवल एक दिमाग है जो खुद नहीं बल्कि इर्द-गिर्द का वातावरण उसको सोचने को मज़बूर कर देता है क्या वो खुद किसी बिंदू पर सोचता है मेरे हिसाब से शायद नहीं ..  

शुक्रवार, दिसंबर 16

एक बार फ़िर आओ कबीर

                              दिशा हीन क्रांतियां, क्रांतियों में भ्रांतियां.. एक अदद क़बीर की ज़रूरत है.कबीर जो क्रांतियों को एक दिशा देगा कबीर जो बिगड़ते आज को सजा देगा  हां उसी क़बीर की जिसने राम रहीम का तमीज़ सिखाया बेशक़ उसी कबीर की बात कर रहा हूं जो अहर्निश चिंतन करघे से बुनता रहा सम्वेदनाओं आसनी.और चदरिया . जी हां उसी क़बीर की प्रतीक्षा है. 
 कबीर मुझे सुनो मेरी चादर तार तार है.. आसनी उफ़्फ़ क़बीरा वो तो बैठने लायक न रही. जिसे देखो कोई मेरी चादर कोई मेरी आसनी खैंच रहा है अबकी ऐसी बुन देना कि अमर हो जाए.. मैं मर जांऊं पर न आसनी फ़टे न चादर झीनी हो. क्या सम्भव है ये..? 
 आओ जुलाहे एक बार आ ही जाओं सब राम रहीम सब को भूल गये इनके राम को ये भूल गए उनके उनको याद दिलाओ कबीर कि "राम रहीमा  बंदूक बम तलवार में नहीं बसते
    कुछ मूरख "अल्ला" की हिफ़ाज़त करने निकले हैं बन्दूकें हाथ लिये क़बीर तुम भी हंसोगे इन मूर्खों की करतूतों पे ये मूरख नहीं जानते  परमपिता को कोई मार सका है..? न ये मनके मनके फ़ेर न पाए अब तक बस दिये जा रहे हैं बांग और पिता तो...!और हां  कुछ  मूरख तो राम को बचाने सायुध निकले राम जो अंतस की ज्योति है..उस.राम के बिना ये न जीवन था न है...और  न ही रहेगा .पर कौन समझाए कैसे समझाए तुम वही राह बताने आ जाओ क़बीर .

मंगलवार, दिसंबर 13

जी रहे हैं हम सिग्मेंट में

पृथ्वीराज चौहान
"क्या खबर लाए हो खबरची...!" मोहम्मद गोरी ने पूछा
खबरची-ज़नाब, हिंदुस्तानी राजा की फ़ौज में खाना चल रहा
किस तरह खाना खा रहे हैं..?
गुस्ताख़ी माफ़ हो हुज़ूर...! आम इंसान जैसे
फ़िर से जाओ.. गौर से देखो..
   खबरची फ़िर गया.. और फ़िर अबकी बार वो बता पाया कि सैनिक अपने अपने ओहदों के हिसाब से खेमों में भोजन कर रहे हैं..
    खाने के लिये बिछे दस्तरख़ान पर गोरी ने उस खबरी को अपने क़रीब बैठाया सभी ने बिस्मिल्लाह की खाते खाते गोरी  तेज़ आवाज़ में बोला-’दोस्तो, इस बात को मैं पहले से ही जानता हूं. ये लोग खा-पी एक साथ नहीं रहे हैं.. इनको हराना उतना मुश्कि़ल नही है. तभी तो मैं बार बार कहता हूं हम ज़रूर जीतेगें.. हुआ भी यही.
                     यही है आज़ का  सच !  आज़ भी हम हमेशा हार जाते हैं,एक नहीं हैं न..?
हममें ऐसा भारत पल रहा है जो हमने खुद अपने लिये बनाया है. ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों के अपने अपने भारत हैं, हिंदी वाला,मराठी वाला, गुजराती वाला, मद्रास वाला, जाने कितने भारत बना लिये इतने तो महाभारत में भी न थे. तभी तो   कसाब-अफ़ज़ल हमारे आंसुओं पर हंसते हैं. हम हैं कि उस सिग्मेंट का मुंह ताक रहे जिसे हम नज़र ही नहीं आते..
                          काश राम लीला मैदान से एक चौथाई हिस्से में ही सही एक बार तो हम  अफ़ज़ल के अंत के लिये जमा हो जाते.. किंतु होते कैसे हम जो जी रहे  हैं सिग्मैंट में..!!

सोमवार, दिसंबर 12

अपनों के प्रति 'क्रूर ज्ञानरंजन - मनोहर बिल्लौरे

  ज्ञान जी पचहत्तर  साल के हो गये। एक ऐसा कथाकार जिसने कहानी के अध्याय में एक नया पाठ जोड़ा। अपना गुस्सा ज्ञान जी ने किस तरह अपनी कहानियों में उकेरा है। पढ़ने-लिखने वाले सब जानते हैं। उसके समीक्षक उसमें खूबियाँ-खमियाँ तलाशेंगे। उत्साह की बात यह है कि आज भी वे पूरे जवान हैं और स्फूर्त भी. उनके साथ सुबह की सैर करने में कभी-हल्की सी दौड़ लगाने जैसा अनुभव होता है। वे अब भी मतवाले हैं जैसे कालेज दिनों में जैसे बुद्धि-भान विधार्थी रहते हैं। साहित्य, समाज, संस्कृति - यदि साहित्य को छोड़ दिया जाये तो अन्य सभी कलाओं के लिये उन्होंने क्या किया, यह बखान करने की बहुत आवश्यकता  मु्झे अभी इस समय नहीं लगती. यह काम कोर्इ लेख या कोइ   एक किताब कर पाये यह संभव भी नहीं। बीते 75 सालों में बचपन और किशोरावस्था को छोड़ दिया जाये (किशोर को कैसे छोड़ दें वह तो उनकी एक कहानी में जीवित मौजूद है - समीक्षकों-आलोचकों ने उसे 'अतियथार्थ कहा है...) तो - उन्होंने 'सच्चे संस्कृति-कर्मी और - धर्मी भी - के जरिये जो कुछ किया उसका बहुत सारा अभी भी छुपा हुआ है, ओट से झांक कर भी जाना नहीं जा सका है - क्योंकि वह इस तरह पैक्ड और सील किया हुआ है और उनकी और उनके चाहने वालों की निज़ी मज़बूत तहखाने की तिजोरियों में तालाबंद है जो उनके और षायद सुनयना जी के? अलावा कोर्इ नहीं जानता, पाशा और बुलबुल भी नहीं। उनके चाहने वाले अनेक साथियों के पाास उनके साथ बिताये गये समयों की ढेरों यादें, संस्मरण और किस्से हैं - जो धीरे-भीरे बाहर आयेगा। बहुत सीमित ही उन तहखानों से निकलकर बाहर आया है और उन्होंने ही उनकी निज़ी और सार्वजनिक जिन्दगी के बारे में बहुत सी बातें प्रकाशित की हैं। अभी 'श्रेष्ठतम और सर्वोत्तम और  पर्फ़ेक्शन  से भरा-पूरा अभी, आज तक बाकी है. कब रहस्य खुलेंगे? कहा नहीं जा सकता। वे लगातार सचेत, जागृत और सक्रिय और चेतन रहे थे, हैं, और रहेंगे ऐसा हमारा विश्वास कहता है। चेतना की जो तरंगमय लहरे उनकी वाणी और देह-भाषा से प्रकाशित होती हैं, वे प्रेरणा को उदग्र करती हैं, गहरा बनाती हैं और प्रगति का वितान रचती हैं। उनके साथ इस षहर में मैंने लगभग 25 से 30 साल का यह अर्सा गुजारा है। लेखन में बचपन से जवान हुआ हूँ। जब उनसे दूर होता हूँ या रहता हूँ एक दमकदार इन्द्रधनुषी हासिये में वे मुझे जब तब दिखार्इ देते रहते हंै। चूँकि, उन्होंने ताजिन्दगी ऐसे ही लागों की वकालत की है - जो वंचित किये गये हैं और हैं, और जबरन किये जा रहे हैं। मैं और मुझ जैसे अनगिनत लोग उनकी रचना और संरचना का पाठ पहली कक्षा से पढ़ रहे हैं और उस ज्ञान (जानकारियाँ नहीं) से लगातार ऊर्जा पाकर समृद्ध हुए और होते रहेंगे। यह सिलसिला मुसलसल जारी है और रहेगा, रुकने वाला नहीं। इसी विष्वास के साथ जबलपुर में उनका पचहत्तरवां  जन्म-दिन पाशा  और बुलबुल की तरफ से हो रहा है। हम सब ने इस दिन (21नवंबर) को मनाने के लिये उनकी स्वीकृति पाने के लिये बड़ी मशक्क़त की है। आयोजन में डिनर के अलावा और क्या-क्या होगा कहा नहीं जा सकता। इस बात की ख़बर सबको लग चुकी है. जिनको नहीं लगी है उनका रिष्ता ज्ञानरंजन से गहरा नहीं है. हम उनका सानिध्य पाते रहे हैं और लम्बे समय तक पाते रहेंगे यह विष्वास हमारा बहुत प्रबल और साथ ही दृढ़ भी है, सपने-में-भी। अभी पांच, छह, और सात नवंबर 11 को इन्दौर में एक विशेष जैविक-कला-प्रदर्शनी के दौरान भी यह तत्थ सबके सामने खुलकर उजागर हुआ. उस दौरान प्रदर्शनी में उन्होंने स्वयं बार-बार कुर्सियों सहित कर्इ चीजों को व्यवसिथत किया और करने के लिये हमें निर्देषित दिया; हम में से कुछ ने इस मौके पर भी उनकी प्यार से भरीपूरी डाँट और फटकार सुनी और उनकी पीठ पीछे मजा लिया. उनके बारे में देर तक गहरी और आत्मीय बातचीत की। उन्हें थोड़ा भी अवैज्ञानिक होने पर गुस्सा आ जाता है, अपनों के प्रति गुस्से में भी उनकी बाडी-लेंग्वेज आत्मीय होती है। आयोजनों की तैयारी या समापन के दौरान वे अचानक और एकाएक एक लय में अपने थैले को कंधे पर लटकाते हैं, उसे थोड़ा सा ऊपर की ओर झटका सा देकर और किन्हीं अपनों को अगल-बगल लगाकर चाय, काफी या नाष्ता कराने ले जाते हैं - जो भूखा है उसे तुरंत खाने-पीने भेज देते हैं या साथ लेकर जाते हैं, जो उन्हें थका सा दिखा उसे वापस ठिये पर लौटकर आराम के लिये मज़बूर कर देते हैं - चेताते हुए - 'कि अब यहाँ दिखना नहीं... यह कहते हुए उनके दाहिना हाथ की मुटठी बंधती है और तर्जनी सीधी होकर दो-तीन बार तेज़ी से आगे-पीछे होती है, फिर वे वहाँ रुकते नहीं हैं तेजी से अपनी मस्त चाल से में किसी कंधे पर हाथ टिका अपनी खास लय से चल देते हैं।उनके साथ सुबह की सैर करते समय मैंने इस लय को पकड़ा। क्या यह एक निरंतर विचार की लय नहीं जिस पर जिस पर शरीर ताल देता हैै?पहल-सम्मानों और दूसरे आयोजनों मैं उनके बायें हाथ में सिगरेट का पैकेट होता था, जब कार्यक्रम अपनी गर्मजोषी में रहता था तब वे बाहर कष लगाते हुए सामने और आजू-बाजू वाले को डिब्बी बढ़ा देते थे, पर कर्इ सालों से उन्हें सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। यह है उनके 'विल-पावर का एक कमाल. कमालों की कमी नहीं उनके खज़ाने में।अपने आसपास पर उनकी दृष्टि  हमेशा गहरी बनी रहती है। उनके पढ़ने की स्पीड बहुत तेज है। यदि उनके कायदे से कोर्इ बाहर जाता है तो वह टीम से भी बाहर हो जाता है।इंदौर में प्रदर्शनी के दौरान चारेक लोगों के बीच बैठे अचानक तर्जनी साधी कर बोले - ''मैं अपनों के प्रति बहुत क्रूर हूँ।
यह बात तो हम सब बहुत पहले से ही जानते और अनुभव करते रहे हैं - प्रेम में भरी क्रूरता या इसके उलट, क्रूरता में भरा प्रेम - ज्ञान जी एक पूर्ण मनुष्य की परिभाषा रचते हैं. अपने किसी साथी की तकलीफ वे गहरार्इ से महसूस कर, संभवता से बढ़कर उसकी मदद करते हैं. यह बात उनसे जुड़े सभी लोगों को पता है। पिता, माँ, भार्इ, दोस्त, प्रेमिका, और स्वजन, तथा पड़ोस के प्रति कू्ररता से सराबोर उनकी कहानियाँ भी पढ़ने वाले सभी पाठक भी उनके इस गुस्से से परिचित हैं। यह सिलसिला केवल कहानियों भर में नहीं है उनके पूरे प्रकट जीवन में है, जो बहुत साफ, स्पष्ट और पारदर्शी है। कोर्इ उनकी डांट से बच नहीं सकता. इस डांट और तथाकथित कू्ररता में अपनत्व और स्नेह-प्रेम से सराबोर दिल और दिमाग है, जो अपने साथी की हर एक गतिविधि को माइक्रोस्कोपिक दृषिट से देखता-परखता है और तदनुसार व्यवहार करता है। यहाँ बस इतना ही, आगे फिर कभी और।
अंत में इतना और जोड़ना चाहूँगा कि -हम उनका सानिध्य पाते रहें हैं और आजीवन पाते रहेंगे यह विष्वास हमारा बहुत प्रबल, गहरा और साथ ही दृढ़ भी है, सपने-में-भी।


मनोहर बिल्लौरे,
1225, जेपीनगर, अधारताल,
जबलपुर 482004 (म.प्र.)
मोबा. - 89821 75385

शुक्रवार, दिसंबर 9

कापी पेस्ट फ़्रोम नुक्कड़ : आल द बेस्ट


राष्ट्रीय सेमिनार लाइव... डेटलाइन- कल्याण (मुम्बई) भाग-II

भोजनावकाश के बाद प्रथम चर्चा सत्र प्रारम्भ हो चुका है। मंच पर विशिष्ट जन आसन जमा चुके हैं। इस सत्र में चर्चा का विषय है- हिंदी ब्लॉगिंग : सामान्य परिचय पूरी जानकारी के लिए और टिप्‍पणी देने के लिए यहां पर क्लिक की...

मुबई में हिन्‍दी चिट्ठाकारों ने नहीं मचाया धमाल : खूब गंभीरता से विमर्श हुआ

आज हम मुम्बई पहुँच गये हैं। यह ब्लॉगरी जो न जगह दिखाए। जी हाँ, हम ब्लॉगरी की डोर पकड़कर अपने घर से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण इलाके में एक महाविद्यालय में अपने ब्लॉगर मित्रों के साथ कुछ खास चर्चा के लिए इकठ्ठा हो गये हैं। किस-किसका जुटान हो चुका है यह बाद में। उद्‌घाटन सत्र शुरू होने जा रहा है। उसके पहले पहली  पूरा पढ़ने और टिप्‍पणी...

THURSDAY, DECEMBER 08, 2011 27 COMMENTSदेश-विदेश के हिन्‍दी चिट्ठाकारों का मुंबई में जमावड़ा :क्‍या आप भी इसमें दिखाई दे रहे हैं

मुंबई चिट्ठाकारों से समृद्ध होती जा रही है एक संगोष्‍ठी आज हुई अ‍नीता कुमार जी के महाविद्यालय में दूसरी हो रही है या हो रही है पुस्‍तक विमोचित कार्य सभी उचित वैसे तो जुट गए हैं चिट्ठाकार खाने में और पीने में भी पियक्‍कड़ चिट्ठाकारों को पहचानिए। बाकी को भी जानिए अभी तो चित्रों की लीजिए बानगी कल जीवंत प्रसारण होगा आते हैं हम अभी आप संभल जाइये यहां...
चिट्ठा क्‍या है विचारों की आग की तपन को मानस तक पहुंचाने का तंदूर जिससे न तो देश दूर है और न विदेश। प्रत्‍येक नेक तन मन के आसपास है जिसका बसेरा। ऐसा नूतन है सवेरा जो प्रात:काल की सूर्य की ऊर्जा प्रदायी किरणों के तौर पर मन में उतरता है और बस जाता है। चिट्ठा कौन बना सकता है प्रत्‍येक जीवधारी या निर्जीव भी चिट्ठे पर सक्रिय रह सकता है। निर्जीव की सक्रियता के लिए क्रिया...

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