रविवार, अप्रैल 25

क्षमा वीरस्य भूषणं :विवाद समाप्त होते है माफ़ी मांगने और माफ़ कर देने से

साथियो, एक दिन मेरे अधीनस्त चपरासी राजू का स्वास्थ्य खराब हो जाने एवम ,एक क्लर्क लापरवाही से ,एक सरकारी काम अनावश्यक बाधा उत्पन्न हुई.सारे काम को अगले एक घंटे में पूरा करना था .मेरा पारा सातवें आकाश पर था . जो जी में आया वो बोल रहा था, चपरासी को गुस्से में यह कह दिया :- सर ही दु:ख रहा था न ? मर नही जाते तुम नौकरी करो तमीज़ से करो. 
बात आई गई हो गई.  किंतु मन में कुछ चल रहा था, क्रोध और उतावला पन बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है, राजू पर मेरा अनावश्यक क्रोध व्यक्त करना मुझे ही सालने लगा, मन खिन्न था अगले दिन . रात भर सोचता रहा राजू के जीवन से ज़्यादा जरूरी काम तो न था बस फ़िर तय किया कि कल चपरासी से माफ़ी मागूंगा. वो भी अकेले में नहीं  सारे स्टाफ़ के सामने .... यह कदम प्रशासनिक दृष्टि से सर्वथा गलत हो सकता है किंतु मानवीय दृष्टि से बहुत ही ज़रूरी . यही है आध्यात्म. बस अगले दिन पूरे स्टाफ़ को बुलाया पिछले दिन के बर्ताव के लिये बे हिचक राजु से कहा:-”भाई, मुझे माफ़ करना, सच कल मैने तुम्हारे लिये जिस वाक्य का प्रयोग किया वो अमानवीय था,इसमें  इंसानियत तनिक भी न थी जाने क्यों मन निर्दयी हो गया जो मैने तुम्हारे लिये कहा कि - सर ही दु:ख रहा था न ? मर नही जाते तुम नौकरी करो तमीज़ से करो”इस बात के लिये मुझे तुमसे माफ़ी चाहिये 
राजु सहित सारे लोग अवाक मुझे टकट्की लगाये देख रहे थे,..... राजु की आंखें मैं नमीं थी, और मेरी आंखो में हल्का पन राजु ने कहा:-सा’ब, आप से इतना सुन के ही मन का मैल धुल गया. आप माफ़ी न मांगिये ...! 
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इस घटना के बाद पिछले दिनों शास्त्री जी ने अपने ब्लाग ललित भाई के ब्लागिंग छोड़ने के ऐलान के दूसरे दिन ही फ़ोटो पर माला डाल के जो किया मेरा मन बहुत दु:खी था. लगा शास्त्री जी से कह दूं.  अनिता कुमार जी से हुई पाडकास्ट चिट्ठाचर्चा में इसका ज़िक्र भी किया किंतु आज़ जब कडुवा सचपर  श्याम भाई की पोस्ट देखी तो लगा कि साहसी है श्याम कोरी उदय जी ............. उससे ज़्यादा खुशी हुई तब जब आदरणीय शास्त्री जी ने टिप्पणी में कहा :-

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक April 25, 2010 9:56 AM   श्याम कोरी "उदय" जी ईश्वर जानता है कि इस पोस्ट को लगाने के पीछे मरी कोई दुर्भावना नही थी!
मुझे नही पता था कि आप इसको इतना तूल देंगे! अब तो मैंने वो सब पोस्ट हटा दीं है! आप सब ही तो मेरी ऊर्जा हैं! सादर सद्भावी!
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक April 25, 2010 9:58 AM   यदि कहीं जाने-अनजाने में कोई भूल हुई हो तो उसके लिए तो एक ही शब्द है "क्षमा"
अंत भला सो सब भला 

13 टिप्‍पणियां:

दीपक 'मशाल' ने कहा…

bahut sakoon milta hai dil ko jab kahin dil ke kalesh mitte dekhta hoon.. abhar aapka Girish ji

M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर बात कही आपने. गलती को मान लेना साधारणतया नहीं हो पाता है चाहते हुए भी. पर अगर मान ले तो उससे बड़ा सुकून भी नहीं है.

'अदा' ने कहा…

aapki bhalmansahat nazar aayi..aapke parti aadar ka bhav aur badh gaya...shastri ji to ham sabke shradhey hain..unke liye kuch bhi kahna mere liye chhota munh badi baat hogi...
aabhaar...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बड़ा मज़ा उस मिलाप में देखा,
जो सुलह हो जाये, जंग होकर!

जी.के. अवधिया ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने "अंत भला सो भला"!

zeal ने कहा…

Life teaches us vital lessons...Every moment is precious....

Wise are they who learn from difference of opinions also...

"To err is human, to forgive is divine"

कविता रावत ने कहा…

Apni galti ko sweekar kar lena Mahanta hai.....
Aapne bahut achha kiya...... bahut sukun mila hota Raju ko aur aapko bhi.... akhir jis din kuch achha hota hai to man khush rahata hi hai.....

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

Respected all i am happy to get your valuable comments on this post.Blog is personal diary to publish our thoughts and memories teach us about how to live & how to behave. pl. never use this forum as a battle ground. nothing is final truth no body superior for on no. 1 because positivity is always on top. Regards to all

ललित शर्मा ने कहा…

दादा जी,
हमारे संस्कार है जो हम अपने से
बड़े बुजुर्गों का सम्मान करते हैं।
और करते रहेंगे आजीवन,
चाहे वे हमारी मुंछे ही क्यों ना उखाड़ लें।
लेकिन हम उनकी शान में कुछ नही कहेंगे।

शास्त्री जी मेरे प्रिय थे,हैं और हमेशा रहेंगे,
नि:संदेह इनके अपार स्नेह का मैं ॠणी हुँ।

और रही बात बैर-दु्श्मनी की तो
इस सब के लिए समय है क्या किसी के पास?
मुझे फ़ोन लगा सकते थे,किसने मना किया था?

जीवन के दिन चार पंछी उड़ जाना
करले जतन हजार पंछी उड़ जाना।

चलिए इस दुखद प्रकरण का पटाक्षेप हो गया।
संवादहीनता ही समस्त विवादों को जन्म देती है।
इससे बच कर ब्लागिंग का आनंद लें।


शास्त्री जी को एक बार पुन: प्रणाम,
शुभाशीष बनाए रखे।

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

R/Dada Lalit ji, Super dada Shastri ji we are very much thankful both of you, i think the matter is totally close after the comments from mr. 9:15 baje, i think misfit become totally fit for dearest/nearest blogger now,thanx

kunwarji's ने कहा…

bhut kuchh sikhaane wali post rahi ji ye,
or aise hi likh-likh kar ise duguna karte rehna ji.....


kunwar ji,

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

अंत भला सो भला!!!

बी एस पाबला ने कहा…

एक संवेदनशील भावाभियक्ति
अंत भला सो सब भला